Saturday, 28 October 2023

नयनों की भाषा पढ़नी है

नयनों की भाषा पढ़नी है

वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।

ठहरी ठोड़ी मुठिया पर यह मुद्रा अंकित करनी है
चंचल चितवन की छबि तेरी हृदय धरा पर धरनी है।
मौन सुनूँ फिर मौन बुनूँ फिर मौन मौन संवाद झरें
मन से मन की अकथ कहानी बिन कानों के सुननी है।।
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।

अभी मलय के पवन झकोरे अपनी वीथी उतरे हैं
रजनी के जगमग करते ये व्योमकेश अभी बिखरे है
टँके रात के आँचल में ये तारक अभी अभी निखरे है
दुःस्वप्नों के घने छलावे अभी अभी तो बिसरे हैं
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है

अभी प्राण की प्यास शेष है नयन मेरे ये निर्निमेष है
अभी वर्तिका के माथे पर दीपशिखा की तपन शेष है।
अरुण कपोलों पर स्मित से छन्दों का विन्यास शेष है
पुलक प्रीत के स्पन्दन की सिहरन तन में निर्विशेष है।।
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।

रामनारायण सोनी
२८.१०.२३

Monday, 16 October 2023

It's You only

Listen! 
Eh you!!
Oh my You!!!
It's true,
I met with live wire last day
The "Live wire" which lits up
The will of living in love
The spirit of feeling enlighten
The refreshment of pure and lovely memories
The plenty healing touches
The meaning of "me and mine"
The wet roses and it's divine smells
The fregrance of pure love
Is'nt it the blessing of almighty God 
Is'nt it the blessing of my 'Supreme'
Thus the day and 
The golden moments leaves,
The unfogettable sparkling traces
In the mind and soul

Hello!
It's_Me and my_you

Ramnarayan Soni


सुनो!
अरे हाँ, तुम!!
मेरे प्रिय आत्मन्!!
सच में,
कल मुझे ऊर्जा का जीवन्त स्रोत मिला
जो मेरे मद्धिम होते जीवन दीप को
जीवन्त कर गया,
जीवन की सोई जिजीविषा जाग सी गई
प्रेम में जीने की उत्कट अभिलाषा
अच्छी अनुभूतियों का अहसास
पावन स्मृतियों का ताजादम होना
मरहम सा मृदुल स्पर्श
बोध करा दिया तुमने
मेरा और मेरी अस्मिता का
अहसास कराया मुझे
नम गुलाबों की पंखुड़ियों की पवित्र सुगन्ध का
विशुद्ध प्रेम की सुगन्ध का
क्या यह उस परमपिता का आशीष नहीं है?
इस प्रकार हमें मिले हैं स्वर्णिम दिवस और क्षण
जिसने हृदय और आत्मा में छोड़े हैं
स्मृति के चमचमाते अवशेष 

रामनारायण सोनी
05.04.2018



Sunday, 15 October 2023

रूह से महसूस करो

रूह से महसूस करो

होगा कोई और ही
जो घर में खुले दरवाजे से आयगा
पर यार मेरे! जान ले जरा कि 
मैं तो धूप का वह टुकड़ा हूँ
बिना खिड़की दरवाजा खोले
बिना कोई शीशा तोड़े
पहुँच जाता हूँ तुझ तक!
अपनी ऊष्मा लिये!!
क्योंकि मैं धूप की शक्ल में
बस एक रूह हूँ
रूह से महसूस करो इसे
हाँ, यह मैं ही हूँ

रामनारायण सोनी
१६.१०.२३

Saturday, 14 October 2023

मैं बरसती बूँद में हूँ

मैं बरसती बूँद में हूँ

फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
भींग लो उस वल्लरी सी मैं सरकती बूँद में हूँ
इन रुपहरे कुन्तलों पर उन अटकती बूँद में हूँ
जो भिंगो दे मग्न मन को मैं लरजती बूँद में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
                             मैं बरसती बूँद में हूँ

टिपटिपाते इन पनालों में है भरा संगीत मेरा
मौन क्यों वीणा हृदय की हर तार में स्पन्द मेरा
गुन गुनाते इन भ्रमर के पर सने और तन सना 
हैं घोलते खुशबू पवन में है वही मकरन्द मेरा
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
                             मैं बरसती बूँद में हूँ

इन्द्र ने खींचा है नभ में उस धनुष के भित्ति में हूँ
बाँदलों की ओट में जो उड़ रही बकपाँति में हूँ
बूँद प्यासे चातकों की तृप्ति करते स्वाँति में हूँ
बीच घन के उस चपल सी चंचला की ज्योति में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
                             मैं बरसती बूँद में हूँ

रामनारायण सोनी
१५.१०.२०२३

Tuesday, 10 October 2023

दिल में फाँस चुभती है

सप्तद्वीपा इस धरा की दूरियाँ सारी मिटा ली
पर मनुज के बीच गहरी खाइयाँ कितनी बना ली।
चन्द्र मंगल सूर्य पर हम शोध में कितने मगन हैं
पर धरा की शान्ति को ही बारुदों से रौंद डाली।।

इस शहर की नींव में वे गाँव कितने ही गड़े हैं
लहलहाते खेत प्यारे सब इसी की बलि चढ़े हैं।
इस विषैले धूम्र से सब बाग उपवन जल मरे हैं
तुम गिरे हैं गर्त में पर चिल्ला रहे हो हम बढ़े हैं।।

मिट्टियों के उन घरों की पीढ़ियाँ भी मर चुकी है
बैलगाड़ी, हल, तिपाई दीमकें सब खा चुकी है।
अब न डोरे और खुरपी की नहीं पहिचान बाकी
कल, मशीनों से मजूरी, रोजगारी मर चुकी है।।

ना कुदाली, पास, बक्खर और पिराणे शेष कोई
खुरपियों की खप्परों की बात करता है न कोई।
ये सभी इतिहास की बन जाएंगे कोई धरोहर
अब न माटी के वे चूल्हे न लिपी कच्ची रसोई।।

रामनारायण सोनी
१०.१०.२३

Saturday, 7 October 2023

दीप मैं अविचल अकम्पित

अंधकार पी पी कर भी तो मैं ना हारा ना थका कभी
जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी
मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी
जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी
मैं अपना धर्म निभाता हूँ 
हर युग में पूजा जाता हूँ

हूँ असंख्य किरणों का स्वामी साहस का प्रतिमान बना
मेरे चहुँ ओर उजालों का अद्भुत प्रभा वितान तना
हो चाहे कितना प्रबल बली वह अन्धकार कितना ही घना
मेरी हुँकारो से डर कर वह खड़ा रहा कुछ दूरी बना
मैं अपना धर्म निभाता हूँ 
हर युग में पूजा जाता हूँ

कुटिया और महलों दोनों में भेद कभी भी नहीं किया
मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया
सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया
सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया
मैं अपना धर्म निभाता हूँ 
हर युग में पूजा जाता हूँ

जलती ज्वाला शीष धरे अभिसिञ्चन उसका करता हूँ
अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ
चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ
शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।
मैं अपना धर्म निभाता हूँ 
हर युग में पूजा जाता हूँ

रामनारायण सोनी
७.१०.२३

Friday, 6 October 2023

वे मेरे ही आँसू हैं

किसी कहानी में जब जब नायक का रोना लिखता हूँ
मेरे निकले आँसू को ही मैं उसके आँसू कहता हूँ।
अवसादों की बरसातें जब मेरा मन झेल नहीं पाता

मेरी कहानी का चरित्र वह भीतर से है घबराता ।।

मेरे पग में चुभी फाँस से नायक को पीड़ा होती है।
मेरे दुःख की करुण कहानी जीना उसको पड़ती है।।
मेरे मन का उद्वेलन ही उसका नासूर बना फिरता।
अनजाने में अपना भोगा उस पर है लादा जाता।।

सच पूछो तो कवि अपना ही इसी बहाने कह जाता है।
जो वह कहीं न कह पाया वो भीतर ही सड़ जाता है।।
प्रिया विरह में बहे अश्रु तब यक्ष नहीं वो रोया था।
कालिदास ने बीज रुदन का अपना उसमें बोया था।।

रामनारायण सोनी
06.10.23

Thursday, 5 October 2023

पत्र तुम्हारा मेरी थाती

पत्र तुम्हारा मेरी थाती 

सम्बोधन में केवल 'प्रिय' ही और अन्त में 'प्रिया' लिखा था
इन दोनों के मध्य पत्र में मुझको खाली स्थान दिखा था।।
पहले तो समझा जल्दी में तुम कुछ हाल नहीं लिख पाई।
या फिर कलम पुरानी होगी सूख गई होगी सब श्याई।।
या फिर लिखने लायक कुछ भी तुमको नहीं लगा होगा।
अन्तर में मेरे प्रति कोई सोया भाव जगा ना होगा।।

अलट पलट कर देखा जब तो पीछे नोट लिखा पाया।
'तुम' से हो कर शुरू पत्र यह, 'मुझ' तक यूँ ही नहीं आया।।
ऊपर खुद तारीख लिखो और पीछे पता स्वयं का लिखना।
बीच प्रिया और प्रिय के, अपने बीच घटा था वह लिखना।।
मैं उन खट्टे मीठे पल को फिर से दोहराने आऊँगी।
गीत लिखे जो तुमने मुझ पर तुम्हें सुनाने आऊँगी।।

फिर से जब पलटा खत उसमें तो तुम ही चित्रलिखी थी।
चारु चपल चितवन मुखड़े पर अधरों पर मुस्कान खिली थी।।
अरुण कपोलों पर कुन्तल की लट कुछ यूँ सँवरी थी।
कोरे कागज की धरती पर तुम छाया बन उभरी थी।।
फिर तो यादों की बरात हृदय के तल पर ऐसे आ उतरी।
जैसे बोराये उपवन में सौ सौ मधुऋतुएँ खुद आ पसरी।। 

तब से अब तक मैं प्रतिदिन मुझ को पत्र नया लिखता हूँ।
अपनी कलम पुरानी यादें बिना मोल के मैं बिकता हूँ।।
नाव मेरी कागज की है यह प्रबल प्रेम के सागर उतरी।
अब झंझा कितने ही आवें फिकर सभी की है बिसरी।।
संदेशों के खालीपन में हर दिन नगर नया बसता है।
मेरे मन के पागलपन पे यह सारा जग ही हँसता  है।।
  
रामनारायण सोनी
६.१०.२३

कुछ तो उसकी बात करो

कुछ तो उसकी बात करो

आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो
रेशम सी वाणी का मधुरस कानों में घोलो बात करो 
उन बोलों को फिर दोहराओ प्रथम मिलन पर जो बोले थे
चपल नयन पर रोक पलक को खोल अधर वो बात करो।
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो।।

उस पल अपने विकल हृदय की धड़कन की वो बात करो
आँगन की लुक्का छुप्पी और पीपल छैंया याद करो
दूर खड़े ही मन ही मन हम कितने उलझे याद करो
कैसी सिहरन हम में दौड़ी थोड़ा वह संवाद करो। 
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो।।

याद तुम्हें तो वह भी होगा हम मूरत से खड़े रह गये
पाँव हमारे वहीं निगोड़े खंभे जैसे गड़े रह गये
साँसें, धड़कन, सुध-बुध सब के सब वे जमे रह गये
जीवन के उन स्वर्णिम लमहों की बोलो कुछ तो बात करो।
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो।।

रामनारायण सोनी
५.१०.२३

Sunday, 1 October 2023

पाषाणों पर के पदचिन्ह

पाषाणों पर के पदचिन्ह

उन्मुक्त आकाश में 
आज का अप्रतिम अरुणोदय 
कालमेघ के छितर जाने का संकेत है 
ईश्वर अकाल पुरुष भी है
और वह कालातीत भी 
तमी के इस ओर के तट पर 
सूरज फिर प्रकाशमान होगा
गन्धवाही हवाएँ विषाक्त धूलि को
उड़ा कर फेंक आवेंगी
किन्ही काली कन्दराओं में
चलो हम अतीत के स्वर्णिम कोष से
कुछ गिन्नियाँ निकाल का खनखनाएँ
उन्हें इन क्षणों के पुनरावर्तन में 
फिर फिर दोहराएँ

रामनारायण सोनी
१.१०.२३

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...