Saturday, 28 October 2023
नयनों की भाषा पढ़नी है
Monday, 16 October 2023
It's You only
Sunday, 15 October 2023
रूह से महसूस करो
Saturday, 14 October 2023
मैं बरसती बूँद में हूँ
Tuesday, 10 October 2023
दिल में फाँस चुभती है
सप्तद्वीपा इस धरा की दूरियाँ सारी मिटा ली
पर मनुज के बीच गहरी खाइयाँ कितनी बना ली।
चन्द्र मंगल सूर्य पर हम शोध में कितने मगन हैं
पर धरा की शान्ति को ही बारुदों से रौंद डाली।।
इस शहर की नींव में वे गाँव कितने ही गड़े हैं
लहलहाते खेत प्यारे सब इसी की बलि चढ़े हैं।
इस विषैले धूम्र से सब बाग उपवन जल मरे हैं
तुम गिरे हैं गर्त में पर चिल्ला रहे हो हम बढ़े हैं।।
मिट्टियों के उन घरों की पीढ़ियाँ भी मर चुकी है
बैलगाड़ी, हल, तिपाई दीमकें सब खा चुकी है।
अब न डोरे और खुरपी की नहीं पहिचान बाकी
कल, मशीनों से मजूरी, रोजगारी मर चुकी है।।
ना कुदाली, पास, बक्खर और पिराणे शेष कोई
खुरपियों की खप्परों की बात करता है न कोई।
ये सभी इतिहास की बन जाएंगे कोई धरोहर
अब न माटी के वे चूल्हे न लिपी कच्ची रसोई।।
रामनारायण सोनी
१०.१०.२३
Saturday, 7 October 2023
दीप मैं अविचल अकम्पित
Friday, 6 October 2023
वे मेरे ही आँसू हैं
किसी कहानी में जब जब नायक का रोना लिखता हूँ
मेरे निकले आँसू को ही मैं उसके आँसू कहता हूँ।
अवसादों की बरसातें जब मेरा मन झेल नहीं पाता
मेरी कहानी का चरित्र वह भीतर से है घबराता ।।
मेरे पग में चुभी फाँस से नायक को पीड़ा होती है।
मेरे दुःख की करुण कहानी जीना उसको पड़ती है।।
मेरे मन का उद्वेलन ही उसका नासूर बना फिरता।
अनजाने में अपना भोगा उस पर है लादा जाता।।
सच पूछो तो कवि अपना ही इसी बहाने कह जाता है।
जो वह कहीं न कह पाया वो भीतर ही सड़ जाता है।।
प्रिया विरह में बहे अश्रु तब यक्ष नहीं वो रोया था।
कालिदास ने बीज रुदन का अपना उसमें बोया था।।
रामनारायण सोनी
06.10.23
Thursday, 5 October 2023
पत्र तुम्हारा मेरी थाती
कुछ तो उसकी बात करो
Sunday, 1 October 2023
पाषाणों पर के पदचिन्ह
कैसे घुल गए हो मुझ में?
कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का? इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...
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वह आवाज दे रही है आवाजें आवाजें ही आवाजें कई कई, किसम किसम की आवाजें कानों की गुफाओं में आती हैं कोई खूबसूरत, कोई विषैली तो कोई कुछ बहुतेरी ...
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हे अंशुमान! भूधर के सुन्दर ललाट पर हिंगुल सी बिखरा रोली पुष्पों की उघरी पलकों पर शलभों की आई टोली सूरज के स्वागत में उषा स्वर्णमाल लेकर बोली...
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पत्थर पर फूल उकेरा था लाऊँ कहाँ से पल लौटा कर जो तुम ले कर चले गये रखूँ कहाँ यादों के पंछी पवन, गगन से छले गये नयन मेरे ये रीत गये हैं, अधरो...