Sunday, 1 October 2023

पाषाणों पर के पदचिन्ह

पाषाणों पर के पदचिन्ह

उन्मुक्त आकाश में 
आज का अप्रतिम अरुणोदय 
कालमेघ के छितर जाने का संकेत है 
ईश्वर अकाल पुरुष भी है
और वह कालातीत भी 
तमी के इस ओर के तट पर 
सूरज फिर प्रकाशमान होगा
गन्धवाही हवाएँ विषाक्त धूलि को
उड़ा कर फेंक आवेंगी
किन्ही काली कन्दराओं में
चलो हम अतीत के स्वर्णिम कोष से
कुछ गिन्नियाँ निकाल का खनखनाएँ
उन्हें इन क्षणों के पुनरावर्तन में 
फिर फिर दोहराएँ

रामनारायण सोनी
१.१०.२३

No comments:

Post a Comment

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...