पाषाणों पर के पदचिन्ह
उन्मुक्त आकाश में
आज का अप्रतिम अरुणोदय
कालमेघ के छितर जाने का संकेत है
ईश्वर अकाल पुरुष भी है
और वह कालातीत भी
तमी के इस ओर के तट पर
सूरज फिर प्रकाशमान होगा
गन्धवाही हवाएँ विषाक्त धूलि को
उड़ा कर फेंक आवेंगी
किन्ही काली कन्दराओं में
चलो हम अतीत के स्वर्णिम कोष से
कुछ गिन्नियाँ निकाल का खनखनाएँ
उन्हें इन क्षणों के पुनरावर्तन में
फिर फिर दोहराएँ
रामनारायण सोनी
१.१०.२३
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