Monday, 8 January 2024

वह आवाज दे रही है

वह आवाज दे रही है

आवाजें
आवाजें ही आवाजें
कई कई, किसम किसम की आवाजें
कानों की गुफाओं में आती हैं
कोई खूबसूरत, कोई विषैली तो कोई कुछ
बहुतेरी लौट जाती हैं यहीं से
मुहाने पर दस्तक दे कर
पर उनमें से ही कुछ शिल्पकार निकलती हैं
जिन्होंने कानों के पर्दे भेद डाले
हृदय की भीतर की पथरीली दीवार पर
छैनियों से एक स्थिर चित्र बना डाला है
उकेर दिया है प्यारा सा अक्षर 'माँ' 
जब जब होता हूँ तनहा तनहा
डोन्ट डिस्टर्ब की तख्ती मुहाने पर टाँगता हूँ
फिर हो जाता टाइम मशीन की मुट्ठी में बन्द
सहसा वह आवाज उठा लेती है मुझे 
भींच लेती है अपनी बाजुओं में 
चिपटा लेती है मुझे अपने सीने से
मेरा स्वर्ग उतर आता है जमीन पर
उस घड़ी, उस पल 
वहाँ बस एक गूँज होती है 'बेटा'
और एक और गूँज होती है 'माँ'
सुनते सुनते मैं सो जाता हूँ 
उसी की गोद में
देखना!
नहीं लौटूँगा एक दिन मैं वहाँ से

रामनारायण सोनी
८.१.२४

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