नेपथ्य के उस पार
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं
इन मुखोटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैं
रो रहा था जो वहाँ पर जगत के सब घाव ले कर
जी रहा था जो वहाँ पर निज व्रणों के स्राव पी कर।
हार कर भी जीत जाने का यहाँ जो स्वांग करता
यह कथानक पीर के ओढ़े खड़ा अभिशाप ले कर।।
पार मुस्कुराते मुखौटे के वह रुदन फिर देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
गुलमोहर की लालिमा तो आग पी पी कर बनी है
कट रहा सीसा कठिन पर काटती लघु सी कनी है।
जिन्दगी की जीभ से हम सुन रहे हैं गीत मधुरिम
बिम्ब में प्रतिबिम्ब में है समर रार यह कैसी ठनी है।।
बिम्ब की निचली तहों की वह घुटन फिर देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
चमचमाते रूप ने जो पहने वसन बहु रंग के हैं
मंच पर भी सामने भी दृश्य सब इक ढंग के हैं।
कथ्य क्या, कर्म में क्या, भाग्य में क्या मर्म में क्या
बन रहा जीवन विदूषक हास ये किस ढंग के हैं।।
इस मुलम्मे के परे की हम बेबसी को देखते है
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
भागती इस जिन्दगी के सब मीत पीछे रह गये
जो गढ़े प्रासाद मन के हाय तिल तिल ढह गये।
लोग हम को क्या कहेंगे हम डरे से, अधमरे से
आग अन्तर में छुपाए बाहर मुस्कुराते रह गये।।
लो उसी इतिहास की खुलती परत को देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
रामनारायण सोनी
२२.११.२३