Thursday, 30 November 2023

भोर की रश्मियाँ

भोर की संकल्पना जगने लगे तो 
काट बन्धन तिमिर को अवसान देना
रात भर लड़ती रही है रश्मियाँ
प्रात को उस पल ज़रा सम्मान देना ।।

हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी वे वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मि को अधिमान देना।।


रामनारायण सोनी
30.11.2023

Wednesday, 29 November 2023

सपने सारे संग ले गये

तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।

क्यों आये क्यों गये जिन्दगी की इस चौखट पर
मैं था मेरी आस उनींदी बाट जोहती तेरी तट पर
बोई प्रीत हथेली सरसों जैसे सूख गई उगते ही
लौटे नहीं रंग जाकर फिर तुमने जो छींटे मनघट पर
तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।

वैसे तो हर माह अमावस का अँधियारा आया है
अबकी बार महीना पूरा अँधियारा ले कर आया है
जो लगते थे कभी सुहाने उन उड़ते मेघों ने मेरे इस 
व्यथित हृदय की तप्त धरा पर क्रन्दन ही बरसाया है
तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।

तुम तो गये गये पर मेरे सपने सारे संग ले गये
तूफानों में घिरी नाव को ऐसे कैसे भँवर दे गये
उस पतंग का ठौर कहाँ जो भाग्यचक्र ने काटी हो
रीता कंठ रुँधी आवजें गीत अधर पर धरे रह गये
तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।

रामनारायण सोनी
३०.११.२३

Friday, 24 November 2023

तो सच कहो!

तो सच कहो!

भाग तो गये हो, 
कि जैसे कोई पानी पर दाैड़ गया हो
बस लहरें कुछ छोड़ गया हो
जैसे डूबता सूरज
लाली बस छोड़ गया हो
काली तमस भरी निशा में
आस का जलता दीप छोड़ गया हो
सच कहो मीत मेरे
मुझ से कभी भी, कहीं भी 
कैसे भी, अलग हो पाये हो क्या?

रामनारायण सोनी

Wednesday, 22 November 2023

नेपथ्य के उस पार

नेपथ्य के उस पार

खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं
इन मुखोटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैं

रो रहा था जो वहाँ पर जगत के सब घाव ले कर
जी रहा था जो वहाँ पर निज व्रणों के स्राव पी कर।
हार कर भी जीत जाने का यहाँ जो स्वांग करता
यह कथानक पीर के ओढ़े खड़ा अभिशाप ले कर।।
पार मुस्कुराते मुखौटे के वह रुदन फिर देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।

गुलमोहर की लालिमा तो आग पी पी कर बनी है
कट रहा सीसा कठिन पर काटती लघु सी कनी है।
जिन्दगी की जीभ से हम सुन रहे हैं गीत मधुरिम
बिम्ब में प्रतिबिम्ब में है समर रार यह कैसी ठनी है।।
बिम्ब की निचली तहों की वह घुटन फिर देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।

चमचमाते रूप ने जो पहने वसन बहु रंग के हैं
मंच पर भी सामने भी दृश्य सब इक ढंग के हैं।
कथ्य क्या, कर्म में क्या, भाग्य में क्या मर्म में क्या
बन रहा जीवन विदूषक हास ये किस ढंग के हैं।।
इस मुलम्मे के परे की हम बेबसी को देखते है
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।

भागती इस जिन्दगी के सब मीत पीछे रह गये 
जो गढ़े प्रासाद मन के हाय तिल तिल ढह गये।
लोग हम को क्या कहेंगे हम डरे से, अधमरे से
आग अन्तर में छुपाए बाहर मुस्कुराते रह गये।।
लो उसी इतिहास की खुलती परत को देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।

रामनारायण सोनी
२२.११.२३

Tuesday, 21 November 2023

चूके तो चुक जाओगे

चूके तो चुक जाओगे

बसन्त गा रहा है, 
पवन खुद झूल रही है 
मस्ती में बेलों के झूले पर
मुस्कुरा रहा है बनफूल शाख पर
नहला रही है किनारे की दूब को
झरने की रेशमी फुहारें
और तुम हो कि
झाँक भर रहे हो 
अपनी बनाई दीवार के
एक बारीक से सूराख से
निकलो बाहर
निकलो अभी बाहर
फैलाओ अपने मन की बाजुएँ इतनी
कि इनमें समा जाए 
कायनात पूरी की पूरी
कौन जाने यह समा फिर लौटे न लौटे
चूके तो चुक ही जाओगे 
रामनारायण सोनी
२१.११.२३

Friday, 10 November 2023

पीत पात झरते हैं

पीत पात झड़ते हैं

अभी अभी बीता है पतझड़
है कुछ मौन अभी बाकी
झरे गिरे से उन पातों की
अभी काल ने यादें ढाँकी

जो जगह पुराने पातों ने
पतझारों में कर दी खाली 
आज नियति ने घुमा चक्र
फिर से नव संसृति रच डाली

पल्लव अपना जीवन लेकर
शाखों पर जब उतरे थे
अपनी करनी के बलबूते
कुछ बिखरे कुछ निखरे थे

पादप के इक इक हिस्से को
अपना धर्म निभाना है
धरा धाम से जो जो पाया
धरा यहाँ रह जाना है

जब कोंपल शाखों में जन्मी
मधुमास बड़ा बौराया था
पीपल ने थी पीटी ताली 
झरनों ने मङ्गल गाया था

उत्स हुआ बन का आंगन
भ्रमरों ने वीथी घूम घूम
देखा पुष्पों को चुपके से
कलिका का माथा चूम चूम

उस पादप का रोआँ रोआँ
था कितना रोमांच भरा
मूलों ने भेजा अभिसिंचन 
था फूलों से मकरंद झरा

उन शाखों से लिपटी लिपटी
मृदु लतिका ने स्पर्श किया
अंकुर का नव अरुणाई से
फिर हौले से श्रृंगार किया

रजनी की शीतल अलकाएँ
शबनम की माला ले आई
फर फर करती चिरिया भी
फुनगी पर बैठी मुस्काई

अमलतास की वेणी लटकी 
केकी करती वृन्दगान
अमरबेल ले पीत वसन
बुन बुन कर ताना है वितान

जीवन के चक्र निराले हैं
कण कण है गतिमान यहाँ
बंजारे की बस्ती ठहरी
है आज यहाँ तो कल वहाँ

जब से यह धरती जन्मी है
काल बली कुछ रचता है
रोज बनाता रोज मिटाता
काल कभी ना मरता है

झर जाऊँगा मैं डाली से
जैसे झरते हैं पीत पात
इससे पहले भी आए हैं
कितने ढलते सांझ प्रात

पर सब के सब वे थे अपने 
कर्मों धर्मों से बँधे बँधे
नियति परिधि में नियमों की
निरत रहे सब सधे सधे 

फिर जीवन की संध्या आई
घूमा था जब वह कालचक्र 
श्वासों की माला टूट चली
थी दृष्टि काल की महावक्र

झरते पातों की तब खुद ही
शाखों से ममता छूट गई
वह साँझ रात की गोदी में
झीनी गागर सी टूट गई

आया पवन झकोरा तब वह
आँगन आँगन दिया बुहार
नियती नटी है कब चुप बैठी
फिर फिर उसने किया सिंगार


रामनारायण सोनी
११.११.२३



Friday, 3 November 2023

मधुगीत गुन गुन कर रहा

मधुगीत गुन गुन कर रहा

शब्दो के इस महारास में, 
अर्थों के मधुरिम प्रभास में
भावों में, अहसासों में, मधुगीत गुन गुन कर रहा है।
                         मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।

दो हृदय दो तन विकम्पित, 
ताल सुर हैं द्रुत विलंबित
बँध पुलिन में बह रही है 
यह धार सरिता की स्वरित।
आगतों के स्वागतों में 
पुष्प के मकरन्द मुखरित 
घन गरज की भेरियाँ सुन 
नाचते है मोर प्रमुदित।।
तार वीणा के जगाने मधुमीत तुन तुन कर रहा है।।
                       मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।

कोकिला के कंठ जागे, 
चातकों के भाग जागे
उपवनों में गंध भारित 
चहुँ दिशा में पवन भागे।
ताल में बनफूल पादप 
पात ने माँडी नव रंगोली
झर झराती झिरनियों के 
मधुरवों के रार जागे।।
श्वाँस में प्रश्वाँस में मनमीत कुन मुन कर रहा है।
                     मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।

रामनारायण सोनी
 ३.११.२३


Thursday, 2 November 2023

रंगमंच के रंग


रंगमंच पर खिलते हैं मंच के रंग
जीवन के महीन, तीखे और मन्द
रंग ही रंग, 
छटा के संग
लेकर उतरता है कलाकार
सबसे ज्यादा वह बोलता है तन से 
आवाज की थिरकती लय सैर कराती है 
हमें जिन्दगी के उतार चढ़ाव की
पर शब्दों से वे
हाँ, शब्द बस थोड़ा सा ही कह पाते हैं
आदमी कितना बोलता है बिना बोले ही
जिन्दगी के रंगमंच पर

रामनारायण सोनी
25.10.23

Wednesday, 1 November 2023

पीड़ा

पीड़ा

ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया
गौतम को जग की पीड़ा ने तपा तपा कर बुद्ध किया।
जन जन की पीड़ा को जब गाँधी जी ने वरण किया 
दूर फिरंगी को कर देंगे मन में दृढ़ संकल्प लिया।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।

दुःखी क्रोंच की पीड़ा से ही प्रथम छन्द इक था जन्मा
पीड़ा की जलती वेदी पर बैठे परमहंस शुचि धर्मा।
कुन्ती ने पीड़ा वर माँगा मन से अंगीकार किया 
अपनी राम कहानी में भी पीड़ा बनी रही उमर भर कर्मा।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।

युगपुरुषों ने कदम कदम पर कितनी बाधा व्यथा सही
निज कर्मों के आलेखन से जग को अपनी कथा कही।
पगथलियों में पीड़ा के हो चाहे जितने घाव भरे
तपी भगीरथ के अनुपथ पर पावन गंगा धार बही।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।

रजनी के आलोक अश्रु को पातों ने जब जब झेला
उसी भोर ठिठुरी पीड़ा में शबनम मोती बन कर खेला।
तम की काली छलनाओं से जब जब रश्मिपुंज डरा
प्राची से पीड़ा हरने को रवि का अरुण सरोज खिला।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।


रामनारायण सोनी
2.11.48


कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...