अंधकार पी पी कर भी तो मैं ना हारा ना थका कभी
जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी
मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी
जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
हूँ असंख्य किरणों का स्वामी साहस का प्रतिमान बना
मेरे चहुँ ओर उजालों का अद्भुत प्रभा वितान तना
हो चाहे कितना प्रबल बली वह अन्धकार कितना ही घना
मेरी हुँकारो से डर कर वह खड़ा रहा कुछ दूरी बना
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
कुटिया और महलों दोनों में भेद कभी भी नहीं किया
मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया
सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया
सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
जलती ज्वाला शीष धरे अभिसिञ्चन उसका करता हूँ
अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ
चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ
शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
रामनारायण सोनी
७.१०.२३
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