Wednesday, 31 January 2024

पत्थर पर फूल उकेरा था

पत्थर पर फूल उकेरा था

लाऊँ कहाँ से पल लौटा कर जो तुम ले कर चले गये
रखूँ कहाँ यादों के पंछी पवन, गगन से छले गये
नयन मेरे ये रीत गये हैं, अधरों के सब गीत गये हैं
निविड़ निशा में दीप आस के अँधियारों से छले गये

छोड़े उन पद चिह्नों को मैं पागल सा देखा करता हूँ
उनमें बिम्ब प्रणय के अपने निशिदिन ढूँढा करता हूँ
इस नदिया के खड़े किनारे, इन पादप वृन्दों से मैं
किधर गये हो? आ कर इन से अकसर पूछा करता हूँ

जिस पत्थर पर पत्थर से ही तुमने फूल उकेरा था
मेरे दिल पर थपकी देकर कुछ वैसा ही चितेरा था
देखो आ कर अब तक दोनों कितने ताजा दम है 
महक रहा है अब भी वैसा जितना पहले घनेरा था

रामनारायण सोनी
२८.१.२४

Tuesday, 30 January 2024

आत्मिका

आत्मिका
"विद्युल्लता के स्पन्दन गीत"
कहते हैं कि हृदय के तारों पर मानवीय संवेदना के संघात से उत्पन्न आत्मस्वर ही गीत है अर्थात् गीत अपनी आत्मरागात्मिकता में जीवन का झंकृत स्वर है। अपने चारों ओर मौजूद विषय, वस्तु, प्रकृति, जीव, जगत की ओर संवेदनात्मक दृष्टि से देखने पर जो स्पन्दन महसूस होते हैं वे गति, यति, लय, स्वर, ताल में निबद्ध हो जावें तो गीत बन जाते हैं लेकिन कभी कभी ये स्वयं यह पूरा बाना पहन कर हृदय खुद ही उतर आते हैं। लय सुंदरता की चरम विधा है और सुंदरता का सीधा सम्बन्ध हृदय से है। यही लय साहित्य में छंद का रूप धारण करती है। काव्य एवं संगीत विधान के लिए उपयुक्त शब्दों की लययुक्त व्यवस्था का नाम ही छंद है। इस कृति के लगभग सारे गीत भावनाओं, संवेदनाओं और स्वसौष्ठव स्वकीय ले कर उतरे हैं। "जो है जैसा है, यहाँ वैसे का वैसा है।"
'विद्युल्लता', 'विद्युल्लता' क्यों हुई:-
विद्युत का भौतिक जीवन आधार -
मेरी स्नातकीय शिक्षा विद्युत यांत्रिकी में हुई और बाद में मैं विद्युतयंत्री के रूप में सेवा रत रहा। वस्तुतः मेरा अध्ययन, अर्जन और उपार्जन तीनों ही 'विद्युत की मातृछाया' व सुखद आश्रय में रहा। यह विद्युत के भौतिक स्वरूप का सानिध्य भी था। इसी विद्युत के संरक्षण और पोषण में मैं और मेरा परिवार अभी भी चल रहा है। पहले वेतन और फिर पेन्शनके रूप में यह अभी भी जीवन का आधार है। इसकी कृपा हमारी स्नायुओं में बसी है और शिराओं में बह रही है। इस पुस्तक के नामकरण में 'विद्युत' शब्द का समावेश होना उसके प्रति हमारी और हमारे परिवार की ओर से आभार प्रकट करना तथा कृतज्ञता ज्ञापित करना है। अगर में यह कहूँ कि हमने विद्युत को भरपूर ढंग से जिया है तो अत्युक्ति नहीं होगी। विद्युत एक जीवनदायिनी प्रकाशमान लता के रूप में हमारे चारों ओर लिपटी हुई है।
विद्युत का आध्यात्मिक आधार - 
विद्युत के आध्यात्मिक स्वरूप का विवरण बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ३ सातवाँ ब्राह्मण: में आता है - 'विद्युत ब्रेह्मेति'।
विद्युत् ब्रह्म इत् आहुः; विदानाद विद्युत्, विद्यात्य एनं पाप्मनः, या एवं वेद, विद्युत् ब्रह्मेति, विद्युत् ह्य एव ब्रह्म।
बिजली की चमक जो बादलों के माध्यम से तब प्रकट होती है जब बादलों में गड़गड़ाहट होती है। यह विद्युत का एक महान कार्य है। बिजली की इस चमक में हम प्रकृति की सुन्दरता को देख सकते हैं। इस प्रकृति की सुंदरता को भी हमें ईश्वर की सुंदरता का प्रतिनिधित्व करने वाला मानना चाहिये। कोई व्यक्ति बिजली की चमक को एक वस्तु के रूप में देख सकता है। बिजली की चमक बादल के अंधेरे को भेद देती है, वैसे ही चेतना की चमक हमारे अन्तःकरण के अंधेरे को भेद देती है। 
विदानाद विद्युत: बिजली रात के अंधेरे में भी सूर्य की अनुपस्थिति के बावजूद अपनी चमक से अंधकार को दूर कर देती है। उसी प्रकार हमारी चेतना की चमक से हम प्रकृति का सौंदर्य और फिर अपनी चेतना ही से परोक्ष में परमात्मा का सौन्दर्य अनुभव कर सकते हैं।
वस्तुतः नारी अथवा प्रकृति को विद्युत की लता के आलोक में देखा जाना प्रकृति के बाह्य सौंदर्य को देखना है। इसी से सृजन कर्ता अर्थात् परमात्मा के सौन्दर्य का दर्शन ही सृष्टि की समग्रता है। जब यह फ्लैश हमारे मन के अन्दर होता है तो हम भीतर-बाहर से चेतना से ऊर्जित हो जाते हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ अंकित प्रकृति रूपी नारी के सौन्दर्य को विद्युतीय लता द्वारा प्रकाशित किया जाना इसी का प्रतीक है।
विद्युत का लौकिक, व्यावहारिक और नैसर्गिक स्वरूप - अपने चारों ओर बिखरी-सिमटी संवेदनाओं तथा प्रेम और प्रकृति के स्पन्दन हृदय में बिजली की लहर जैसा उत्प्रेरण करते हैं। ये स्पन्दन ही यहाँ संकलित हैं।
जैसे विद्युत का उक्त भौतिक, आन्तरिक और आध्यात्मिक स्वरूप तथा उसका जीवन मूल्यों पर प्रभाव वर्णित है। उसी प्रकार इस गीतात्मक कविता संग्रह में तात्विक रूप से परमात्मा का वैभव, प्रकृति का स्वाभाविक सौंदर्य और जन जन के अवचेतन में व्याप्त सुख-दुःख, प्रेम-विरह, राग-अनुराग की रसानुभूति के सूक्ष्मावलोकन करने का प्रयास है। 
आशा है आप जैसे अनुरागी प्रिय पाठकों को यह प्रयास पसन्द आवेगा और कृति को आपका आशीष प्राप्त होगा।

रामनारायण सोनी

Friday, 26 January 2024

गाओ रे! झूम झूम!

गान मस्ती के उकेरो
रागिनी स्वर ले स्वयं ही
कण्ठ में भर जायगी
झनझनाती पायलों की
थाप पर थिरकन चले तो
क्या कामिनी रुक पायगी?
वह गत सुनाती जायगी

मौज में उड़ती पतंगे
देखती है कब जमी पर
डोर को भी टाँगती वह
नील नभ की खूँटियों पर
जब हवा के पंख लगते
खिलखिलाती जायगी
वह गत सुनाती जायगी

बूँद बन कर जा मिलो तुम
धार जो मस्ती में बहती
या मिलो बरखा में तुम जो
झूम कर मस्ती में झरती
या बनो शबनम सुबह की
ऋतु शरद वो सुहानी आयगी
वह गत सुनाती जायगी

है जरा सी जिन्दगी ही
पुष्प की और गन्ध की भी
गोद में वह पालता भी
बाँटता मधुर मकरन्द भी
जानता निज कंटकों से 
सब पंखुड़ी छिद जायगी
वह गत सुनाती जायगी

रामनारायण सोनी
२७.१.२४


Thursday, 25 January 2024

झुर्रियों की शक्ल में

झुर्रियों की शक्ल में

झुर्रियों की शक्ल में इस उम्र ने लिक्खी कहानी
सिलवटों के जाल पल पल कह रहे सब कुछ जुबानी
आँख से जो बह रहा यह खार रिश्तों के सफर का
कँपकँपाते ओठ कहते कुसकुसाती वो कहानी

सिलवटों के जाल में घुस कष्ट ने कस दी रकाबें
इन फटी बेवाइयों ने लिख रखी कितनी किताबें
चादरों में छुप छुपा कर जो बिलखते कौन जाने
फाड़ डाली जिन्दगी की अपनों ने सारी किताबें

याद के उठते बवण्डर, हैं झेलते वे मौन रह कर
जब कुरेदा है किसी ने वे उगलते हैं फफक कर
जिन्दगी भर जो कमाया लाड़लों ने सब छुड़ाया
जब थका यह शुष्क पिंजर, अब न कोई दर, न घर

भाग्य से उनकी कमाई हाथ इन के आ गई है
लोभ के भीषण भँवर से बुद्धि ही मारी गई है
एक दिन इनका भी ऐसा आयगा ये बेखबर हैं
चूर हैं कैसे नशे में नियति ही मति खा गई है

रामनारायण सोनी
२६.१.२४

Wednesday, 24 January 2024

गीत गाता हूँ मैं

गीत गाता हूँ मैं

अक्षरों से शब्द तक का यह सफर
चेतना फिर हो चले जिस में प्रखर
भाव की उत्प्रेरणा जब जागती है
तब कहीं इक गीत होता है मुखर
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

वेदना, संवेदना, प्रतिवेदना मिल
हो गलित इक धार में बहने लगे
खुद बहे पहले, सभी उसमें बहें
तो समझ लो गीत हैं उठने लगे
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत का उत्थान भी इक ज्वार है
गीत काली रात का अभिसार है
गीत भावों की विकल अभिव्यंजना
गीत अधरों का मधुर श्रृंगार है
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

प्रियतमा के नैन से जब नीर बहता
श्वाँस में प्रश्वाँस में है गीत चलता
जब प्रणय की रागिनी में हो घुला
छ्न्द बन्दों में स्वयं ही गीत ढलता
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत करुणा की मृदुल सी धार है
गीत घुंघरू की मुखर झंकार है
गीत दिल के बादलों से झर रही
झिरमिराती सी मधुर मनुहार है
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत हैं उत्सव, हैं गीत भी कलरव
स्वर्ग भी हैं ये, हैं और ये रौरव
सुख के और दुःख के अधिमान भी
हैं पुरातन के पुरोधा और अभिनव
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत हैं आलाप उठता कण्ठ से
गीत भीगा है कहीं मकरन्द से
गीत उठता नाद है मिरदंग से
झर रहा अनुराग हो हर छ्न्द से
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत लय है गीत सुर है ताल भी
गीत गति है गीत मद्धिम चाल भी
शौर्य का आह्वान करते गीत हैं
गीत मारक शक्ति भी है ढाल भी
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत गाथागीत बन जग में रमा
लोकरंजक गीत ने बाँधा समा
लोकमंगल गीत बिन कैसे शुरू
गीत ही हर उत्स की है मधुरिमा
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

प्रीत की पावन धरा में बीज सा
भावना के सिन्धु में है मीन सा
पुष्प के हर अंग में अभ्यंग में
महमहाता गीत है मधुमास सा
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

गीत जीवन जीवनी के गा रहा
प्रेम की पगडण्डियों पे ला रहा
एक बन्जारा समझलो आज मैं
कारवाँ के गीत अपने गा रहा
    गीत गाता हूँ, मैं गीत गाता हूँ

रामनारायण सोनी
२५.०१.२४

Sunday, 21 January 2024

वे लकीरें

बन गई पगडण्डियाँ ये हाथ की तिरछी लकीरें
खो गई मंजिल बची बस हाथ की तिरछी लकीरें
इस रोशनी के गाँव में हैं आ बसे सब ओर साये
भाग्य की कोरी घिसावन लग रही तिरछी लकीरें

इन लकीरों ने मुझे भी था कभी तुम से मिलाया 
प्रीत का प्यारा रसायन था कभी तुम ने पिलाया
अब अचानक खो गई वे हाथ की सारी लकीरें
लोरियाँ गा कर कभी था कष्ट में मुझको सुलाया

रामनारायण सोनी
२२.१.२४

विद्युल्लता की समीक्षाएँ

शुभाकांक्षा

कविता न्यूनतम शब्दों में अधिकतम की अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ संसाधन होती है । कविता मन को एक साथ ही हुलास , उजास और सुकून देती है । नौकरी और साहित्य के मेरे समान धर्मी श्री रामनारायण सोनी के कविता संग्रह विद्युल्लता को पढ़ने का सुअवसर मिला । संग्रह में भक्ति काव्य की निर्मल रसधार का अविरल प्रवाह करती समय समय पर रची गई सत्तर कवितायें संग्रहित हैं । सभी रचनायें भाव प्रवण हैं । काव्य सौष्ठव परिपक्व है । सोनी जी के पास भाव अभिव्यक्ति के लिये पर्याप्त शब्द सामर्थ्य है । वे विधा में पारंगत भी हैं । उनकी अनेक पुस्तकें पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं , जिन्हें हिन्दी जगत ने सराहा है । सेवानिवृति के उपरांत अनुभव तथा उम्र की वरिष्ठता के साथ रामनारायण जी के आध्यात्मिक लेखन में निरंतर गति दिखती है । कवितायें बताती हैं कि कवि का व्यापक अध्ययन है , उन्हें छपास या अभिव्यक्ति का उतावलापन कतई नहीं है । वे गंभीर रचनाकर्मी हैं ।
सारी कवितायें पढ़ने के बाद मेरा अभिमत है कि शिल्प और भाव , साहित्यिक सौंदर्य-बोध , प्रयोगों मे किंचित नवीनता , अनुभूतियों के चित्रण , संवेदनशीलता और बिम्ब के प्रयोगों से सोनी जी ने विद्युल्लता को कविता के अनेक संग्रहों में विशिष्ट बनाया है ।  आत्म संतोष और मानसिक शांति के लिये लिखी गई ये रचनायें आम पाठको के लिये भी आनंद दायी हैं । जीवन की व्याख्या को लेकर कई रचनायें अनुभव जन्य हैं । उदाहरण के लिये "नेपथ्य के उस पार" से उधृत है ... खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं, इन मुखौटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैँ । जैसी सशक्त पंक्तियां पाठक का मन मुग्ध कर देती हैं । ये मेरे तेरे सबके साथ घटित अभिव्यक्ति है ।
संग्रह से ही  दो पंक्तियां हैं ... " वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है , आज व्यथा को टांग अलगनी गाथा कोई गढ़नी है । " मोहक चित्र बनाते ये शब्द आत्मीयता का बोध करवाने में सक्षम हैं । रचनायें कवि की दार्शनिक सोच की परिचायक हैं ।
रामनारायण जी पहली ही कविता में लिखते हैं " तुम वरेण्य हो , हे वंदनीय तुम असीम सुखदाता हो .... सौ पृष्ठीय किताब की अंतिम  रचना में ॠग्वेद की ॠचा से प्रेरित शाश्वत संदेश मुखर हुआ है । सोनी जी की भाषा में " ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल , जलधारा प्राणों की लेकर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल " ।
यह जीवन प्रवाह उद्देश्य पूर्ण , सार्थक और दिशा बोधमय बना रहे । इन्हीं स्वस्ति कामनाओ के साथ मेरी समस्त शुभाकांक्षा रचना और रचनाकार के संग हैं । मैं चाहूंगा कि पाठक समय निकाल कर इन कविताओ का एकांत में पठन ,मनन , चिंतन करें रचनायें बिल्कुल जटिल नहीं हैं वे अध्येता का  दिशा दर्शन करते हुये आनंदित करती हैं ।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
वरिष्ठ समीक्षक , कवि और व्यंग्यकार
सेवा निवृत मुख्य अभियंता
ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , जे के रोड , भोपाल ४६२०२३
भोपाल दिनांक २१ जनवरी २०२४


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Monday, 8 January 2024

वह आवाज दे रही है

वह आवाज दे रही है

आवाजें
आवाजें ही आवाजें
कई कई, किसम किसम की आवाजें
कानों की गुफाओं में आती हैं
कोई खूबसूरत, कोई विषैली तो कोई कुछ
बहुतेरी लौट जाती हैं यहीं से
मुहाने पर दस्तक दे कर
पर उनमें से ही कुछ शिल्पकार निकलती हैं
जिन्होंने कानों के पर्दे भेद डाले
हृदय की भीतर की पथरीली दीवार पर
छैनियों से एक स्थिर चित्र बना डाला है
उकेर दिया है प्यारा सा अक्षर 'माँ' 
जब जब होता हूँ तनहा तनहा
डोन्ट डिस्टर्ब की तख्ती मुहाने पर टाँगता हूँ
फिर हो जाता टाइम मशीन की मुट्ठी में बन्द
सहसा वह आवाज उठा लेती है मुझे 
भींच लेती है अपनी बाजुओं में 
चिपटा लेती है मुझे अपने सीने से
मेरा स्वर्ग उतर आता है जमीन पर
उस घड़ी, उस पल 
वहाँ बस एक गूँज होती है 'बेटा'
और एक और गूँज होती है 'माँ'
सुनते सुनते मैं सो जाता हूँ 
उसी की गोद में
देखना!
नहीं लौटूँगा एक दिन मैं वहाँ से

रामनारायण सोनी
८.१.२४

Saturday, 6 January 2024

हे अंशुमान

हे अंशुमान!

भूधर के सुन्दर ललाट पर हिंगुल सी बिखरा रोली
पुष्पों की उघरी पलकों पर शलभों की आई टोली

सूरज के स्वागत में उषा स्वर्णमाल लेकर बोली
उतरो तुम हे ज्योतिमान! जग का कण तुम्हें बुलाता
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता

आह्लादित उषा उद्यत है करने को अभिषेक तुम्हारा
शीतल मन्द पवन ने बह कर सारा आगम पंथ बुहारा
अरुण अश्व पर आरोहित हो कण कण में उत्साह भरो
बरसे कृपा तुम्हारी सब पर तन मन में व्यापे उजियारा
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता

हे अंशुमान, हे दिव्य ज्ञान हे, हो जग के तुम महाप्राण
हे पाप विमोचक, कष्ट निवारक तुमसे ही जग दृष्यमान
तुम से ही ऋतुएँ जन्मे और तुम से ही मधुमास झरे
हे प्रणतपाल अनुकम्पा कर स्वीकारो मेरा अर्घ्यदान
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता

तुम ओजस तेजस के दाता, त्याग, तपस्या के प्रमाण
दुःख दरिद्र के तुम हो हर्ता, चेतनता का तुम विधान
निखिल सृष्टि के पालक धारक तेजपुञ्ज वो तिमिर हरण
मैं प्रणत भाव से करता हूँ स्वीकारो हे देव नमन
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता

रामनारायण सोनी
7.1.24

Friday, 5 January 2024

फिर माटी माटी में धर दी

फिर माटी माटी में धर दी

तुमने नयन दिये जग देखूँ पर आँसू उसमें रच डाले
देख सकूँ सच को सच सा फिर सम्मोहन क्यूँ भर डाले।
दे दी प्यास अगर मुझको यह फिर मरीचिका क्यूँ दे दी
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इनमें छाले।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इनमें छाले।।
                          किसके जीवन करूँ हवाले ?

स्वीकारे अभिषाप नियति के सब तेरे वरदान समझ कर
पग पग पर क्यूँ भरे छलावे व्याकुल हूँ आकण्ठ उलझ कर।
अधरों को वरदान दिया वे मुखड़े पर मुस्कान बिखेरें
फिर क्यों पीना पड़ता इनको कालकूट के प्याल भर भर।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
                         किसके जीवन करूँ हवाले ?

साँस रची जीवन जीने को तो क्यों फिर उसांसें भर दी
बल का कर आधान करों में पाप पुण्य सिर गठरी धर दी।
क्यों माटी को रौंद रहे तुम खेल खेल में बारी बारी
पहले जीवन माटी में भर, फिर माटी माटी में धर दी।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
                         किसके जीवन करूँ हवाले ?

सागर के इस छोर खड़ा मैं भरी सुनामी सागर में
जर्जर तरणी अपनी ले कर कैसे उतरूँ सागर में
सागर तू है सागर तेरा और सुनामी भी तो तेरी
कौन उबारे मुझे उफनते और विकट भवसागर में
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
                         किसके जीवन करूँ हवाले ?

रामनारायण सोनी
04.01.24

Wednesday, 3 January 2024

चल रे जीवन उछल उछल



ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल
जलधारा प्राणों की ले कर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल
जन्म मृत्यु के बीच क्षितिज है तेरा यह क्रीड़ांगण
इसमें भर उल्लास वृती हो रथ अपना दौड़ाता चल
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

तुझमें सूरज की आभा है तुझमें बसी चन्द्रिका शीतल
थामो वल्गा ऋत की कर में धर्म कर्म के चक्र सबल
कुचलो निष्ठुर बाधाओं को, हहर हहर रथ की गूँजे
गूँजें यश के सामगान ये पथ भी होवे सुगम सरल
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

खुले नयन से खुली दृष्टि से खुले खुले मन के वातायन
खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन 
तू अजेय प्राणों के स्वामी कण कण करता यश गायन
फूँको पाञ्चजन्य ऐसा जो कम्पित कर दे धरा गगन
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

पद प्रहार से बाधा कुचले पौरुष से उत्तुङ्ग शिखर
हुँकारों की टकराहट से चट्टानें भी जाएँ बिखर
धरती से अम्बर तक यश की ध्वजा पताका जाय फहर
लिखो कहानी ऐसी अद्भुत जग में चमके भाल प्रखर
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

रामनारायण सोनी
04.01.24


गीत ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त-37 से प्रेरित है।
क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्।
कण्वा अभि प्र गायत।।
(1:37:1:)

Monday, 1 January 2024

दिल का दर्पण टूट गया

अगर प्रेम है पूजा तो फिर वह पीछे क्यूँ छूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?

परवाजों के पैरों में बँध उड़ उड़ तुम तक जाता था
निर्मम बैरी बाज समय आ बीच राह क्या लूट गया?
क्या इतना है सहज मिटाना खिंची लकीरें पत्थर पर की
अगर प्रेम सागर था फिर क्यूँ गागर सा यह फूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया

प्रेम निलय था रूहें जिसके अन्तःपुर में बसती थी
प्रेम वाटिका में मधुवन्ती पावन पवन विचरती थी
किसलय की कोमल कलिकाएँ लू पीकर भी खिलती थी
क्या माली ही स्वयं बसन्ती बाग बहारें लूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?

प्रीत हमारी अग्निपरीक्षा दे दे कर ना कुम्हलाई
मीरा बन कर पिया हलाहल कोई आँच नहीं आई
टूटे तार भले वीणा के फिर फिर वह आलाप जगाई
फिर हलके से कंपन से ही दिल का दर्पण टूट गया
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?

रामनारायण सोनी

३०.१२.२३

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...