मैं बरसती बूँद में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
भींग लो उस वल्लरी सी मैं सरकती बूँद में हूँ
इन रुपहरे कुन्तलों पर उन अटकती बूँद में हूँ
जो भिंगो दे मग्न मन को मैं लरजती बूँद में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
मैं बरसती बूँद में हूँ
टिपटिपाते इन पनालों में है भरा संगीत मेरा
मौन क्यों वीणा हृदय की हर तार में स्पन्द मेरा
गुन गुनाते इन भ्रमर के पर सने और तन सना
हैं घोलते खुशबू पवन में है वही मकरन्द मेरा
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
मैं बरसती बूँद में हूँ
इन्द्र ने खींचा है नभ में उस धनुष के भित्ति में हूँ
बाँदलों की ओट में जो उड़ रही बकपाँति में हूँ
बूँद प्यासे चातकों की तृप्ति करते स्वाँति में हूँ
बीच घन के उस चपल सी चंचला की ज्योति में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
मैं बरसती बूँद में हूँ
रामनारायण सोनी
१५.१०.२०२३
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