हे अंशुमान!
भूधर के सुन्दर ललाट पर हिंगुल सी बिखरा रोली
पुष्पों की उघरी पलकों पर शलभों की आई टोली
सूरज के स्वागत में उषा स्वर्णमाल लेकर बोली
उतरो तुम हे ज्योतिमान! जग का कण तुम्हें बुलाता
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता
आह्लादित उषा उद्यत है करने को अभिषेक तुम्हारा
शीतल मन्द पवन ने बह कर सारा आगम पंथ बुहारा
अरुण अश्व पर आरोहित हो कण कण में उत्साह भरो
बरसे कृपा तुम्हारी सब पर तन मन में व्यापे उजियारा
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता
हे अंशुमान, हे दिव्य ज्ञान हे, हो जग के तुम महाप्राण
हे पाप विमोचक, कष्ट निवारक तुमसे ही जग दृष्यमान
तुम से ही ऋतुएँ जन्मे और तुम से ही मधुमास झरे
हे प्रणतपाल अनुकम्पा कर स्वीकारो मेरा अर्घ्यदान
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता
तुम ओजस तेजस के दाता, त्याग, तपस्या के प्रमाण
दुःख दरिद्र के तुम हो हर्ता, चेतनता का तुम विधान
निखिल सृष्टि के पालक धारक तेजपुञ्ज वो तिमिर हरण
मैं प्रणत भाव से करता हूँ स्वीकारो हे देव नमन
जीवन के भी तुम हो जीवन, हो तुम भाग्य विधाता
रामनारायण सोनी
7.1.24
No comments:
Post a Comment