मेरी कलम लिखा करती है
बिना पते का पत्र रोज यह
मेरी कलम लिखा करती है
कितना रोकूँ किन्तु निगोड़ी
आँसू सी झर-झर झरती है
मन का कम्पन लिखते लिखते
इसका तन कँप-कँप जाता है
भावों का स्पन्दन जब लिखती
कण्ठ प्राण रुँध-रुँध जाता है
इसका परिणय उद्वेलन से
विक्षेपों का ही उन्मीलन है
विपुल वेदना के पनघट में
व्याप रहा निर्मम क्रन्दन है
मूक हृदय की मधुर व्यथा को
मूक गगन ने ही देखा है
लिखते लिखते मौन हो गई
कोरा षृष्ठ अमर लेखा है
कितनी बार लिखा है, लाड़ो!
कितने आलिङ्गन लिख डाले
कभी कभी यह बरबस लिखती
विधुर हृदय के विगलित छाले
चंचल चितवन जब लिखती है
रोम रोम पुलकित होता है
कोरों का काजल लिखने पे
अंजन स्वयं मुदित होता है
माथे की बिन्दी जब लिखती
काया कुमकुम हो जाती है
मृदुल हास अरुणिम कपोल का
लिखते ही खिल खिल जाती है
रामनारायण सोनी
२७.०२.२४