सप्तद्वीपा इस धरा की दूरियाँ सारी मिटा ली
पर मनुज के बीच गहरी खाइयाँ कितनी बना ली।
चन्द्र मंगल सूर्य पर हम शोध में कितने मगन हैं
पर धरा की शान्ति को ही बारुदों से रौंद डाली।।
इस शहर की नींव में वे गाँव कितने ही गड़े हैं
लहलहाते खेत प्यारे सब इसी की बलि चढ़े हैं।
इस विषैले धूम्र से सब बाग उपवन जल मरे हैं
तुम गिरे हैं गर्त में पर चिल्ला रहे हो हम बढ़े हैं।।
मिट्टियों के उन घरों की पीढ़ियाँ भी मर चुकी है
बैलगाड़ी, हल, तिपाई दीमकें सब खा चुकी है।
अब न डोरे और खुरपी की नहीं पहिचान बाकी
कल, मशीनों से मजूरी, रोजगारी मर चुकी है।।
ना कुदाली, पास, बक्खर और पिराणे शेष कोई
खुरपियों की खप्परों की बात करता है न कोई।
ये सभी इतिहास की बन जाएंगे कोई धरोहर
अब न माटी के वे चूल्हे न लिपी कच्ची रसोई।।
रामनारायण सोनी
१०.१०.२३
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