पत्र तुम्हारा मेरी थाती
सम्बोधन में केवल 'प्रिय' ही और अन्त में 'प्रिया' लिखा था
इन दोनों के मध्य पत्र में मुझको खाली स्थान दिखा था।।
पहले तो समझा जल्दी में तुम कुछ हाल नहीं लिख पाई।
या फिर कलम पुरानी होगी सूख गई होगी सब श्याई।।
या फिर लिखने लायक कुछ भी तुमको नहीं लगा होगा।
अन्तर में मेरे प्रति कोई सोया भाव जगा ना होगा।।
अलट पलट कर देखा जब तो पीछे नोट लिखा पाया।
'तुम' से हो कर शुरू पत्र यह, 'मुझ' तक यूँ ही नहीं आया।।
ऊपर खुद तारीख लिखो और पीछे पता स्वयं का लिखना।
बीच प्रिया और प्रिय के, अपने बीच घटा था वह लिखना।।
मैं उन खट्टे मीठे पल को फिर से दोहराने आऊँगी।
गीत लिखे जो तुमने मुझ पर तुम्हें सुनाने आऊँगी।।
फिर से जब पलटा खत उसमें तो तुम ही चित्रलिखी थी।
चारु चपल चितवन मुखड़े पर अधरों पर मुस्कान खिली थी।।
अरुण कपोलों पर कुन्तल की लट कुछ यूँ सँवरी थी।
कोरे कागज की धरती पर तुम छाया बन उभरी थी।।
फिर तो यादों की बरात हृदय के तल पर ऐसे आ उतरी।
जैसे बोराये उपवन में सौ सौ मधुऋतुएँ खुद आ पसरी।।
तब से अब तक मैं प्रतिदिन मुझ को पत्र नया लिखता हूँ।
अपनी कलम पुरानी यादें बिना मोल के मैं बिकता हूँ।।
नाव मेरी कागज की है यह प्रबल प्रेम के सागर उतरी।
अब झंझा कितने ही आवें फिकर सभी की है बिसरी।।
संदेशों के खालीपन में हर दिन नगर नया बसता है।
मेरे मन के पागलपन पे यह सारा जग ही हँसता है।।
रामनारायण सोनी
६.१०.२३
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