ओ प्रवासी मानसर के
चेतनाएँ खो चली हैं अब सभी निर्वात नभ में
खो गये संवेदना के स्वर किसी वीभत्स रव में।
बन्दिनी होती हवाएँ अब न होंगी फिर बहारें
उपवनों में पुष्प बिखरे हैं किसी सूखे विवर में।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।
लुट चुकी वे शाख सारी नीड़ जिन पर था बनाया
इक पहाड़ी थी यहाँ पर आदमी ने खोद खाया।
अब वहाँ ना वृक्ष होंगे बस निरे गड्ढे बचे हैं
जल रही धू धू धरा यह अब न कोई शेष छाया।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।
चील गायब हो गई सब चील गाड़ी उड़ रही हैं
गड़गड़ाती दमकलों की भीड़ भारी जुड़ रही है।
हैं भरे तालाब सारे काईयों जलकुम्भियों से
प्लास्टिकों की थैलियाँ सारे जहाँ में चल रही हैं।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।
इस हवा में जहर घोला है प्रदूषण अब चरम पर
कीटनाशक घासनाशक हो रहे भारी कृषि पर।
खा रहे हैं वो हलाहल हर निवाले में सभी हम
हो रहा बाजार भारी आक्रमण है सेहतों पर।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।
रामनारायण सोनी
५.८.२३