Monday, 21 August 2023

बटुवे में पल

बटुवे में पल

मैंने तुम्हें दिये थे वे
जो चुने हुए अनगढ़ से बनफूल
मुरझा गये होंगे, सूख गये होंगे
झड़ कर बिखर गये होंगे 
अपनी अक्खड़ डंठलों से 
और....
तुमने मुझे दिये हैं वे
प्यार की खुशबू भरे पल
वे महकते ही रहते हैं 
दिल के बटुवे की 
अन्दरूनी तहों में
अभी भी जस के तस...

रामनारायण सोनी
२७.०७.२३

Friday, 18 August 2023

हार में जीत है

तुम बिना हारे जीते हो
मैं हार कर भी नहीं हारा
क्योंकि मैं तो
तुम्हें जिताने के लिये हारा हूँ
तुम्हें जिताना चाहता था..
क्योंकि मैंने इसे अपनी जीत समझा है
फर्क इतना सा ही है
कि तुम जीत कर जीते
मैं हार कर जीता हूँ
तुमने जीत को जीत माना है
मैंने हार को जीत सिद्ध किया है
तुम जीतते नहीं तो मैं हार जाता
मैं जीत गया होता, तो वह मेरी हार होती
तुम्हारी जीत का स्वाद अलग
मेरी जीत का स्वाद अलग

रामनारायण सोनी
२४.०७.२३

Friday, 4 August 2023

ओ प्रवासी मानसर के

ओ प्रवासी मानसर के

चेतनाएँ खो चली हैं अब सभी निर्वात नभ में
खो गये संवेदना के स्वर किसी वीभत्स रव में।
बन्दिनी होती हवाएँ अब न होंगी फिर बहारें
उपवनों में पुष्प बिखरे हैं किसी सूखे विवर में।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।

लुट चुकी वे शाख सारी नीड़ जिन पर था बनाया
इक पहाड़ी थी यहाँ पर आदमी ने खोद खाया।
अब वहाँ ना वृक्ष होंगे बस निरे गड्ढे बचे हैं
जल रही धू धू धरा यह अब न कोई शेष छाया।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।

चील गायब हो गई सब चील गाड़ी उड़ रही हैं
गड़गड़ाती दमकलों की भीड़ भारी जुड़ रही है।
हैं भरे तालाब सारे काईयों जलकुम्भियों से
प्लास्टिकों की थैलियाँ सारे जहाँ में चल रही हैं।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।

इस हवा में जहर घोला है प्रदूषण अब चरम पर
कीटनाशक घासनाशक हो रहे भारी कृषि पर।
खा रहे हैं वो हलाहल हर निवाले में सभी हम
हो रहा बाजार भारी आक्रमण है सेहतों पर।।
लौट जाओ देश अपने
ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी
इस नगर के उस नगर के।।

रामनारायण सोनी
५.८.२३

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...