किसी कहानी में जब जब नायक का रोना लिखता हूँ
मेरे निकले आँसू को ही मैं उसके आँसू कहता हूँ।
अवसादों की बरसातें जब मेरा मन झेल नहीं पाता
मेरी कहानी का चरित्र वह भीतर से है घबराता ।।
मेरे पग में चुभी फाँस से नायक को पीड़ा होती है।
मेरे दुःख की करुण कहानी जीना उसको पड़ती है।।
मेरे मन का उद्वेलन ही उसका नासूर बना फिरता।
अनजाने में अपना भोगा उस पर है लादा जाता।।
सच पूछो तो कवि अपना ही इसी बहाने कह जाता है।
जो वह कहीं न कह पाया वो भीतर ही सड़ जाता है।।
प्रिया विरह में बहे अश्रु तब यक्ष नहीं वो रोया था।
कालिदास ने बीज रुदन का अपना उसमें बोया था।।
रामनारायण सोनी
06.10.23
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