Friday, 29 December 2023

मेरे दीपस्तम्भ

कौन था वो ...
जो राह दिखलाता रहा
कौन था वो जो...
दुर्गम पथ में लिए जाता रहा
मैं अकेला खड़ा था विमूढ़ सा
ऐसे में उँगली पकड़े लिये जाता रहा
जानता नहीं था, मैं मुझको ही
वो मुझी से मुझी को मिलाता रहा।

कौन थे, क्या थे वे मेरे लिये?
उस एक सक्ष में समाया था 
मेरा गुरू, मेरा मित्र, मेरा प्रदर्शक
वे थे परम आदरणीय के.एस. रावत सा.

हे दिव्यात्मा!!
तुम प्रणम्य हो! अभिनन्दनीय हो!!
मैं ईश्वर का कृतज्ञ हूँ कि 
उसने मेरे जीवन में 
तुम्हें ट्रान्सफार्म करने भेजा। 
मेरे वटवृक्ष, मेरे दीपस्तम्भ!
प्रणम्य मनसा देवं। दिव्यं च तदात्मा:।।
ॐ शान्तिः! शान्ति:!! शान्तिः!!!

  प्रणत, मैं

Monday, 25 December 2023

आईना, प्रतिबिम्ब और तुम

आज का लघुचिन्तन

आईना, प्रतिबिम्ब और तुम?
(जीवन दर्शन)

•आईना अपना कुछ नहीं, तुम्हारा सच बोलता है। कभी कभी वह आभासी सच बोलता है जैसे कि बायें गाल पर लगे तिल को प्रतिबिम्ब में दायें गाल पर बताता है। तुम रीयल हो वह वर्च्यूअल है। तुम बिम्ब हो वह छाया है। तुम आत्मतत्व हो वह असत् है।
•तुम साफ साफ दिखो इसके लिये समय समय पर उस पर लगी गर्द को साफ करते रहना जरूरी है। विज्ञान कहता है कि तुम्हारे साइज के आधे का आईना तुम्हें पूरा पूरा दिखा सकता है। तुम्हें बाह्य दृष्टि से आईने में दिखने वाले स्थूल के दर्शन होंगे। आईने में तुम स्वयं को देख सको यह शक्ति तुम्हारी अपनी लाक्षणिक क्षमता है।
•आईने का सच असल में तुम्हारा ही सच है। तुम्हारे चेहरे की झुर्रियाँ आईना नहीं मिटा सकता। लेकिन तुम देखने में सक्षम होने के बावजूद स्वयं के मुख को देख नहीं सकते। तुम्हें  अपना आत्मस्वरूप देखने के लिये जरूर चाहियेगा।
•तुम्हारी रोती शक्ल को आइना मुस्कुराता हुआ नहीं बता पाएगा। आईना तुम्हारे सिद्धान्त नही आचरण और व्यवहार बताता है। भीतर के सिद्धान्त कर्मों के रूप में रूपायित होते हैं।
•आईना तुम्हारा इतिहास नहीं वर्तमान बताता है। उसके पास इतिहास होता तो वह तुम्हें तुम्हारा बचपन दिखा देता। वह रीयल टाइम कमेन्ट्री है। वह तुम्हारे आँसुओं से आईना गीला नहीं होगा। आत्मा अलिप्त है, कर्म परिलब्धि है और फल परिणाम है।
•तुम्हारे अँधेरे में वह मौन है पर तुम्हारे उजाले वह तुम्हें तुमको लौटा देता है। वर्तमानकाल का संज्ञान जानना हो तो आईने की फंक्सनालिटी से सीखो। भविष्य भी वह नहीं दिखा सकता। आईना तुम्हे साहस देगा। अँधेरा अज्ञान है और प्रकाश ज्ञानस्वरूप है।
•अपना आईना टूटने मत दो वरना तुम टुकड़े टुकड़े दिखाई दोगे। आत्मा की मौलिकता जगत की टूटन से प्रभावित नहीं होती। मतलब बाहरी टूटन से अन्तस को अलग रखो। मन की टूटन अन्तःकरण से दूर रहे।
•अपने खुद के सच से डर कर आईना देखना छोड़ मत देना वरना हो सकता है तुम फिक्टीशियस वर्ल्ड में जीते रहोगे। बाह्य दृष्टि समष्टि का बोध कराती है और अन्तर्दृष्टि अन्तःकरण का। तुम समष्टि में कैसे हो यह आईना बताएगा।
•आईना तुम्हारा जितना स्पष्ट सच बताएगा उतना दुनिया में कोई नही बता सकता। प्रकृति की इस त्रिगुणमयी संकल्पना में उस अन्य दृष्टा की मनोवृत्ति का प्रतिबिम्ब होगे इसलिये तुम्हें आत्मदृष्टा होना चाहिये। 
•तुम खुद भी खुद से झूँठ बोल लेते हो पर आईना नहीं। यह तुम्हारा अन्तर्द्वन्द्व है। यह मन और बुद्धि के बीच का संघर्ष है। इस संघर्ष के वर्तमान को तुम्हारे मुख पर उभरे भावों को, रसों को पढ़ कर तुम्हें बता सकता है।
●आइना स्थूल है, बिम्ब कर्म है और तुम स्वयं आत्मा हो। जो तुम हो, वही मैं भी हूँ। तत्वमसि।

रामनारायण सोनी
२२.१२.२३
चिन्तन के आधार स्रोत..
श्रीमद्भगवद्गीता

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।15.11।।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।5.21।।

Sunday, 24 December 2023

मैं नाचता-गाता भी हूँ

मैं नाचता-गाता भी हूँ

अपने भीतर ही भीतर कभी कभी मैं
नाचता हूँ, गाता हूँ, उछलता हूँ, कूदता हूँ
क्योंकि मैं उस घड़ी 
मेरे भीतर में होता है एक महारास
और तब तब गाता हूँ 
कबीर के अनहद के बोल ले कर, 
नाचता हूँ पहन कर मीरा के पगघुँघरू,
उछलता हूँ कान्हा की गेंद बन कर 
कूदता हूँ आनन्द की कालिन्दी में
उसी कदम्ब की डाल से 
तब तब यह सारा बाहर
पड़ा रह जाता है बाहर ही
रह जाता हूँ मैं और मेरा वह

रामनारायण सोनी
२५.१२.२३
 

Monday, 18 December 2023

यों ही मुझको भूल सकोगी ?

यों ही मुझको भूल सकोगी?

टूटे दिल की किरच किरच में देखोगी प्रतिबिम्ब गड़ा
पाओगी मुझको ही जब तुम धूल भरा सा वहाँ पड़ा।
तब भी तुमको ही ढूँढेंगी रूह मेरी बिखरे सपनों में
पाओगी मन के आँगन में मुझको अब भी वहीं खड़ा।।

जितना सच था बचपन उतना मेरा प्रेम निवेदन सच है
जितना रस था बीच हमारे मुझमें शेष अभी भी सच है।
ज्वालाओं में तप कर निखरे मन कुन्दन सा उतना सच है
जितना पावन धरा गगन का रिश्ता उतना रिश्ता सच है।।

रामनारायण सोनी
१८.१२.२३

बिखरो खुशबू की तरह

बिखरो खुशबू की तरह

ये माना कि खुशबू! खुशबू है
कुदरत की नायाब सी इनायत
फिर भी छ्टपटाती है
भीतर ही भीतर, 
ढूँढती ही रहती है
कोई फूल, कोई कस्तूरी मृग
मिल जावे कहीं से
ताकि बिखर सके दिग्दिगन्त में
तुममें भी कुछ अच्छा मौजूद है
जो चाहता है बिखरना
मुझ में भी है
चलो ढूँढते हैं वे फव्वारे
जहाँ से बिखर सकें हम
खुशबुओं, झरनों, धूप 
और बारिश की तरह

रामनारायण सोनी
१९.१२.२३

Friday, 15 December 2023

जय जय हे गुरुदेव

जय जय हे गुरुदेव!

तुम क्षितिज के पार से वो युक्ति कोई ढूँढ लाओ
केंचुली में मैं बँधा हूँ आ इसे तुम खोल जाओ।
जो वचन तुमने दिया था हाथ मस्तक पर छुआ था
मैं घिरा अवसाद से हूँ कर कृपा गुरूदेव आओ।।

अन्ध उर में घोर रजनी दण्ड ले कर आ खड़ी है
पाश है जकड़े हुए भवबन्ध की बाधा बड़ी है।
व्यर्थना से उम्र भर ये झोलियाँ मैनें भरी है
पार तुम उतरावगे भवसिन्धु से, आशा बड़ी है।।

मैं तृणों की नोक सा हूँ तुम गहन आकाश से हो
मैं अकिंचन, मैं प्रवासी, मुक्ति के तुम द्वार से हो।
तुम अभय के हो प्रदाता, सीस चरणों में नवाऊँ
तुम प्रथम, अन्तिम तुम्हीं इस दीन के विश्वास से हो।।

रामनारायण सोनी
१३.१२.२३

Monday, 11 December 2023

तुम कहाँ चले?

तुम कहाँ चले 

अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले

अपनी गहन पिपासा ले कर आशा के मृग जीते थे
नभ में मेघों के शावक से सपने दौड़े फिरते थे।
अन्तस की सूने जंगल में कुछ शूलों फूलों के संग
किंशुक अपने शुष्क अधर से दावानल को पीते थे।।
पतझड़ में मन के शलभों की प्रीत जगा कर कहाँ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।।

सागर की छाती पर मैं था लहर लहर सा खेल रहा
शिखर चढ़े ध्वज सा मैं कितने अंधड़ को था झेल रहा।
सूने पनघट रीती गागर थका थका अभिसार लिये
मरुथल की तपती ज्वाला में यहाँ वहाँ था डोल रहा।।
ऐसे में रूखे अधरों पर प्यास जगा कर कहाँ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।।

तुमसे पहले इस दरपन में मुखड़े आ कर चले गये
धड़कन के तारों को यों ही हिला डुला कर भले गये।
उनके गीतों की धारा में पागल मन ना बहा कभी
खिली साँझ में द्वार देहरी दीप जले नित नये नये।।
मन के गोपन कोने की तुम आसंदी क्यों छोड़ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।

रामनारायण सोनी
१२.१२.२३

Monday, 4 December 2023

राम को नाम अधार है

राम को नाम अधार है

प्रीत गयी सब रीत गई गये सारे ठाठ ठठेरन के
सब तात गये मन मीत गये टूटे सपन सबेरन के
ठठरी का है छूटा ठौर कहीं न नाते रहे ममेरन के
थक हार गिरे कछु धाय चले बंजारे लोग बसेरन के

नाम गया अरु धाम गया राउर रंक मिले एहि घाटे
छैल छबीली ओ जोगी जती अन्त मिलै सबै एहि बाटे 
कौन सहाय करै बिना पनही राह बिछे काँटे ही काँटे
राम को नाम है एक अधार सबही भव बंधन काटे

रामनारायण सोनी




कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...