इस अमावस में भरी है तिमिर की ही सर्जनाएँ
दीप भी सारे बुझे हैं मर चुकी सब वर्तिकाएँ
ढूँढने निकली तमी खुद जुगनुओं की जोत मद्धिम
श्याम घन आ कर खड़ा ले बाजुओं में वर्जनाएँ
ढूँढते हो चाँद को तुम इस निरे थोथे निलय में
खोजते हो क्यों चमन को खुद गढ़े अपने प्रलय में
हे मनुज! तू हो गया इतना निरंकुश और निर्मम
मर चुकी संवेदनाएँ क्या सभी तेरे हृदय में
ठोकरें तुमको लगेगी यह समय चेता रहा है
प्राण के लाले पड़ेंगे कण्ठ ऐंठा जा रहा है
नियति की टेढ़ी भृकुटि भी देख कर अनजान है
काल का भीषण भँवर भी क्यों नजर ना आ रहा है
ईश ने सारी धरा पर भर दिये उपभोग पग पग
तू इन्हें जीवन बना ले रख करीने से ये हर डग
चार दिन की जिन्दगी में सौ बरस का ठाठ भर कर
सर पे बोझा ढो रहा है चाल चलता है तू डग मग
फिर न होंगी ये फिजाएँ ना बहारें ना सुकूं ही
ना चिरैया, ना मधुपरी और जल में जलपरी ही
वृक्ष, गिरिवर और वन भी नोच डाले बेरहम हो
खुद मरेगा, मार सब को ना बचेगी यह जमीं ही
आज के सुख में तुम्हारी पीढ़ियाँ भी जल मरेगी
बिन हवा के प्राण की ये वंशियाँ फिर ना बजेगी
बींध डाली, इस धरा को कुछ न पानी ही बचेगा
ना रुका अब भी अगर तू खाक बस तेरी बचेगी
रामनारायण सोनी
१२.०९.२०२३