Sunday, 10 September 2023

खाक बस तेरी बचेगी

इस अमावस में भरी है तिमिर की ही सर्जनाएँ
दीप भी सारे बुझे हैं मर चुकी सब वर्तिकाएँ 
ढूँढने निकली तमी खुद जुगनुओं की जोत मद्धिम
श्याम घन आ कर खड़ा ले बाजुओं में वर्जनाएँ

ढूँढते हो चाँद को तुम इस निरे थोथे निलय में 
खोजते हो क्यों चमन को खुद गढ़े अपने प्रलय में
हे मनुज! तू हो गया इतना निरंकुश और निर्मम
मर चुकी संवेदनाएँ क्या सभी तेरे हृदय में

ठोकरें तुमको लगेगी यह समय चेता रहा है
प्राण के लाले पड़ेंगे कण्ठ ऐंठा जा रहा है
नियति की टेढ़ी भृकुटि भी देख कर अनजान है
काल का भीषण भँवर भी क्यों नजर ना आ रहा है

ईश ने सारी धरा पर भर दिये उपभोग पग पग
तू इन्हें जीवन बना ले रख करीने से ये हर डग
चार दिन की जिन्दगी में सौ बरस का ठाठ भर कर
सर पे बोझा ढो रहा है चाल चलता है तू डग मग

फिर न होंगी ये फिजाएँ ना बहारें ना सुकूं ही 
ना चिरैया, ना मधुपरी और जल में जलपरी ही
वृक्ष, गिरिवर और वन भी नोच डाले बेरहम हो
खुद मरेगा, मार सब को ना बचेगी यह जमीं ही

आज के सुख में तुम्हारी पीढ़ियाँ भी जल मरेगी
बिन हवा के प्राण की ये वंशियाँ फिर ना बजेगी
बींध डाली, इस धरा को कुछ न पानी ही बचेगा
ना रुका अब भी अगर तू खाक बस तेरी बचेगी

रामनारायण सोनी
१२.०९.२०२३

Sunday, 3 September 2023

मौसम बीता जाय

मौसम बीता जाय
आज उतरे मेघ मन पर उर धरा की तृप्ति ले कर
आज अम्बर की पलक पर झुक रहा सावन मुखर।
लोचनों में प्रीत भर कर मैं खड़ा हूँ देख प्रियवर
क्षितिज तक फैली भुजाएँ कण्ठ का मधुभार ले कर।।
तुम न आये प्यार का मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर आय या फिर ना आए।।

तुम प्रणय की रागिनी हो मैं बुनूँगा गीत मधुरिम
रेशमी फर सी फुहारों का सुनो तुम साज मद्धम।
आज मन का मोर यह कर यहा है नृत्य छमछम
प्राण में सुलगी अनल जो है बढ़ाती प्यास रिमझिम।।
तुम न आये प्यार का मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर आय या फिर ना आए।।

रामनारायण सोनी
१८.०८.२३

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...