Tuesday, 19 March 2024

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में

अकेला निकला था
अकेला ही निकल लूँगा
साथ मिला भी तो किस किस का? 
इसका, उसका, तुम्हारा, उनका
कोई रुका, तो कोई खिसका
कोई मिला मन भर, तो कोई भिनका
बिछुड़े सभी बारी बारी
एक तुम हो कि घुल गये हो 
मुझ में, मेरे मन में, अवचेतन में 
निकल भी जाओ अभी बाहर 
नहीं तो! नहीं तो...
जल जाओगे मेरी इस माटी के संग संग
देखो! सुनो!! समझो! मान भी जाओ !
ऐसे में, जीवन के उस पार
कैसे पा सकूँगा फिर से तुम्हें

रामनारायण सोनी
20.3.24

Saturday, 16 March 2024

दो टुकड़े

जब भी लिखता हूँ
मैं बात मेरी लिखता हूँ
अपने पन्नों पर अपनी कलम से लिखता हूँ
कोई नहीं जानता
थोड़ी देर बाद मैं भी नहीं जानता
किसके लिये? क्यों? और किस सबब से
वह बातें उगल गई
अनजाने सच सच कह गई
जाने कब वह
जमाने के दिलों की, इसकी, उसकी
और तुम्हारी मिल्कियत हो गई

रामनारायण सोनी
१५.३.२४

रोज रोज ही दौड़ता हूँ मैं
उस क्षितिज के उस बिंदु की तरफ
जहाँ से आखिरी बार
ओझल हुई थी तुम
लौट कर घर आने से पहले ही
घिर आती है बैरी साँझ,
जलाता हूँ फिर वही दीप
जो भरसक फैलाई अपनी रोशनी में
वह भी ढूँढता है तुम्हें ही
सौंपने के लिये तुम्हें मुझे
फिर लील गया अँधियार उसे भी
मन है कि मानता नहीं 
फिर भी, फिर से वही

रामनारायण सोनी
१५.३.२४





Tuesday, 12 March 2024

कच्चे रंगीन धागे

कच्चे रंगीन धागे 

वक्त आता है दबे पाँव
बँटवारा कर जाता है खून का
एक हिस्से को मिलता है छत, दीवारें, देश
दूसरे को अनचीता, अनबूझा विदेश 
खाली हो जाता है ऑंगन, अँगीठियां भी
माथे पर पीछे से चपत मार कर 
भागने जाने वाली वह चुहल बाज छाया 
तब से, बस आती है एक दिन
सावन के उस आखिरी दिन
बाँध कर लौट जाती है 
कच्चे रंगीन धागे कलाइयों में बाँध कर

रामनारायण सोनी

कैसे घुल गए हो मुझ में?

कैसे घुल गए हो मुझ में अकेला निकला था अकेला ही निकल लूँगा साथ मिला भी तो किस किस का?  इसका, उसका, तुम्हारा, उनका कोई रुका, तो कोई खिसका कोई ...