ध्वंस के उस पार
कोई पल
कभी पुराना नही होता
कोई चेहरा
कभी सयाना नही होता
झर गये पात
बिसर गई टहनी
करुण कथा फिर फिर क्यों कहनी?
फिर शाखों पर होंगे
प्रसव नवांकुरों, नवपातों के
यहीं ये कोपलें पत्तों की वंशज होंगी
यही तो है सृष्टि और समष्टि का
अनवरत, अविरल प्रवाह
ध्वंस के उस पार खड़ा है
सृजन का नव्य संसार
फिर क्यों नहीं कृतित्व भव्य होगा?
रामनारायण सोनी
२७.०७.२३