Thursday, 27 July 2023

ध्वंस के उस पार

ध्वंस के उस पार

कोई पल
कभी पुराना नही होता
कोई चेहरा
कभी सयाना नही होता
झर गये पात
बिसर गई टहनी
करुण कथा फिर फिर क्यों कहनी?
फिर शाखों पर होंगे
प्रसव नवांकुरों, नवपातों के
यहीं ये कोपलें पत्तों की वंशज होंगी
यही तो है सृष्टि और समष्टि का
अनवरत, अविरल प्रवाह
ध्वंस के उस पार खड़ा है
सृजन का नव्य संसार
फिर क्यों नहीं कृतित्व भव्य होगा?

रामनारायण सोनी
२७.०७.२३

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