नयनों की भाषा पढ़नी है
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।
ठहरी ठोड़ी मुठिया पर यह मुद्रा अंकित करनी है
चंचल चितवन की छबि तेरी हृदय धरा पर धरनी है।
मौन सुनूँ फिर मौन बुनूँ फिर मौन मौन संवाद झरें
मन से मन की अकथ कहानी बिन कानों के सुननी है।।
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।
अभी मलय के पवन झकोरे अपनी वीथी उतरे हैं
रजनी के जगमग करते ये व्योमकेश अभी बिखरे है
टँके रात के आँचल में ये तारक अभी अभी निखरे है
दुःस्वप्नों के घने छलावे अभी अभी तो बिसरे हैं
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है
अभी प्राण की प्यास शेष है नयन मेरे ये निर्निमेष है
अभी वर्तिका के माथे पर दीपशिखा की तपन शेष है।
अरुण कपोलों पर स्मित से छन्दों का विन्यास शेष है
पुलक प्रीत के स्पन्दन की सिहरन तन में निर्विशेष है।।
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।
रामनारायण सोनी
२८.१०.२३
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