Wednesday, 3 January 2024

चल रे जीवन उछल उछल



ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल
जलधारा प्राणों की ले कर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल
जन्म मृत्यु के बीच क्षितिज है तेरा यह क्रीड़ांगण
इसमें भर उल्लास वृती हो रथ अपना दौड़ाता चल
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

तुझमें सूरज की आभा है तुझमें बसी चन्द्रिका शीतल
थामो वल्गा ऋत की कर में धर्म कर्म के चक्र सबल
कुचलो निष्ठुर बाधाओं को, हहर हहर रथ की गूँजे
गूँजें यश के सामगान ये पथ भी होवे सुगम सरल
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

खुले नयन से खुली दृष्टि से खुले खुले मन के वातायन
खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन 
तू अजेय प्राणों के स्वामी कण कण करता यश गायन
फूँको पाञ्चजन्य ऐसा जो कम्पित कर दे धरा गगन
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

पद प्रहार से बाधा कुचले पौरुष से उत्तुङ्ग शिखर
हुँकारों की टकराहट से चट्टानें भी जाएँ बिखर
धरती से अम्बर तक यश की ध्वजा पताका जाय फहर
लिखो कहानी ऐसी अद्भुत जग में चमके भाल प्रखर
       चल रे जीवन उछल उछल।।
       चल रे चल तू अमल तरल।।

रामनारायण सोनी
04.01.24


गीत ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त-37 से प्रेरित है।
क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्।
कण्वा अभि प्र गायत।।
(1:37:1:)

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