आत्मिका
"विद्युल्लता के स्पन्दन गीत"
कहते हैं कि हृदय के तारों पर मानवीय संवेदना के संघात से उत्पन्न आत्मस्वर ही गीत है अर्थात् गीत अपनी आत्मरागात्मिकता में जीवन का झंकृत स्वर है। अपने चारों ओर मौजूद विषय, वस्तु, प्रकृति, जीव, जगत की ओर संवेदनात्मक दृष्टि से देखने पर जो स्पन्दन महसूस होते हैं वे गति, यति, लय, स्वर, ताल में निबद्ध हो जावें तो गीत बन जाते हैं लेकिन कभी कभी ये स्वयं यह पूरा बाना पहन कर हृदय खुद ही उतर आते हैं। लय सुंदरता की चरम विधा है और सुंदरता का सीधा सम्बन्ध हृदय से है। यही लय साहित्य में छंद का रूप धारण करती है। काव्य एवं संगीत विधान के लिए उपयुक्त शब्दों की लययुक्त व्यवस्था का नाम ही छंद है। इस कृति के लगभग सारे गीत भावनाओं, संवेदनाओं और स्वसौष्ठव स्वकीय ले कर उतरे हैं। "जो है जैसा है, यहाँ वैसे का वैसा है।"
'विद्युल्लता', 'विद्युल्लता' क्यों हुई:-
विद्युत का भौतिक जीवन आधार -
मेरी स्नातकीय शिक्षा विद्युत यांत्रिकी में हुई और बाद में मैं विद्युतयंत्री के रूप में सेवा रत रहा। वस्तुतः मेरा अध्ययन, अर्जन और उपार्जन तीनों ही 'विद्युत की मातृछाया' व सुखद आश्रय में रहा। यह विद्युत के भौतिक स्वरूप का सानिध्य भी था। इसी विद्युत के संरक्षण और पोषण में मैं और मेरा परिवार अभी भी चल रहा है। पहले वेतन और फिर पेन्शनके रूप में यह अभी भी जीवन का आधार है। इसकी कृपा हमारी स्नायुओं में बसी है और शिराओं में बह रही है। इस पुस्तक के नामकरण में 'विद्युत' शब्द का समावेश होना उसके प्रति हमारी और हमारे परिवार की ओर से आभार प्रकट करना तथा कृतज्ञता ज्ञापित करना है। अगर में यह कहूँ कि हमने विद्युत को भरपूर ढंग से जिया है तो अत्युक्ति नहीं होगी। विद्युत एक जीवनदायिनी प्रकाशमान लता के रूप में हमारे चारों ओर लिपटी हुई है।
विद्युत का आध्यात्मिक आधार -
विद्युत के आध्यात्मिक स्वरूप का विवरण बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ३ सातवाँ ब्राह्मण: में आता है - 'विद्युत ब्रेह्मेति'।
विद्युत् ब्रह्म इत् आहुः; विदानाद विद्युत्, विद्यात्य एनं पाप्मनः, या एवं वेद, विद्युत् ब्रह्मेति, विद्युत् ह्य एव ब्रह्म।
बिजली की चमक जो बादलों के माध्यम से तब प्रकट होती है जब बादलों में गड़गड़ाहट होती है। यह विद्युत का एक महान कार्य है। बिजली की इस चमक में हम प्रकृति की सुन्दरता को देख सकते हैं। इस प्रकृति की सुंदरता को भी हमें ईश्वर की सुंदरता का प्रतिनिधित्व करने वाला मानना चाहिये। कोई व्यक्ति बिजली की चमक को एक वस्तु के रूप में देख सकता है। बिजली की चमक बादल के अंधेरे को भेद देती है, वैसे ही चेतना की चमक हमारे अन्तःकरण के अंधेरे को भेद देती है।
विदानाद विद्युत: बिजली रात के अंधेरे में भी सूर्य की अनुपस्थिति के बावजूद अपनी चमक से अंधकार को दूर कर देती है। उसी प्रकार हमारी चेतना की चमक से हम प्रकृति का सौंदर्य और फिर अपनी चेतना ही से परोक्ष में परमात्मा का सौन्दर्य अनुभव कर सकते हैं।
वस्तुतः नारी अथवा प्रकृति को विद्युत की लता के आलोक में देखा जाना प्रकृति के बाह्य सौंदर्य को देखना है। इसी से सृजन कर्ता अर्थात् परमात्मा के सौन्दर्य का दर्शन ही सृष्टि की समग्रता है। जब यह फ्लैश हमारे मन के अन्दर होता है तो हम भीतर-बाहर से चेतना से ऊर्जित हो जाते हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ अंकित प्रकृति रूपी नारी के सौन्दर्य को विद्युतीय लता द्वारा प्रकाशित किया जाना इसी का प्रतीक है।
विद्युत का लौकिक, व्यावहारिक और नैसर्गिक स्वरूप - अपने चारों ओर बिखरी-सिमटी संवेदनाओं तथा प्रेम और प्रकृति के स्पन्दन हृदय में बिजली की लहर जैसा उत्प्रेरण करते हैं। ये स्पन्दन ही यहाँ संकलित हैं।
जैसे विद्युत का उक्त भौतिक, आन्तरिक और आध्यात्मिक स्वरूप तथा उसका जीवन मूल्यों पर प्रभाव वर्णित है। उसी प्रकार इस गीतात्मक कविता संग्रह में तात्विक रूप से परमात्मा का वैभव, प्रकृति का स्वाभाविक सौंदर्य और जन जन के अवचेतन में व्याप्त सुख-दुःख, प्रेम-विरह, राग-अनुराग की रसानुभूति के सूक्ष्मावलोकन करने का प्रयास है।
आशा है आप जैसे अनुरागी प्रिय पाठकों को यह प्रयास पसन्द आवेगा और कृति को आपका आशीष प्राप्त होगा।
रामनारायण सोनी
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