Monday, 1 January 2024

दिल का दर्पण टूट गया

अगर प्रेम है पूजा तो फिर वह पीछे क्यूँ छूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?

परवाजों के पैरों में बँध उड़ उड़ तुम तक जाता था
निर्मम बैरी बाज समय आ बीच राह क्या लूट गया?
क्या इतना है सहज मिटाना खिंची लकीरें पत्थर पर की
अगर प्रेम सागर था फिर क्यूँ गागर सा यह फूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया

प्रेम निलय था रूहें जिसके अन्तःपुर में बसती थी
प्रेम वाटिका में मधुवन्ती पावन पवन विचरती थी
किसलय की कोमल कलिकाएँ लू पीकर भी खिलती थी
क्या माली ही स्वयं बसन्ती बाग बहारें लूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?

प्रीत हमारी अग्निपरीक्षा दे दे कर ना कुम्हलाई
मीरा बन कर पिया हलाहल कोई आँच नहीं आई
टूटे तार भले वीणा के फिर फिर वह आलाप जगाई
फिर हलके से कंपन से ही दिल का दर्पण टूट गया
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?

रामनारायण सोनी

३०.१२.२३

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