Sunday, 21 January 2024

विद्युल्लता की समीक्षाएँ

शुभाकांक्षा

कविता न्यूनतम शब्दों में अधिकतम की अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ संसाधन होती है । कविता मन को एक साथ ही हुलास , उजास और सुकून देती है । नौकरी और साहित्य के मेरे समान धर्मी श्री रामनारायण सोनी के कविता संग्रह विद्युल्लता को पढ़ने का सुअवसर मिला । संग्रह में भक्ति काव्य की निर्मल रसधार का अविरल प्रवाह करती समय समय पर रची गई सत्तर कवितायें संग्रहित हैं । सभी रचनायें भाव प्रवण हैं । काव्य सौष्ठव परिपक्व है । सोनी जी के पास भाव अभिव्यक्ति के लिये पर्याप्त शब्द सामर्थ्य है । वे विधा में पारंगत भी हैं । उनकी अनेक पुस्तकें पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं , जिन्हें हिन्दी जगत ने सराहा है । सेवानिवृति के उपरांत अनुभव तथा उम्र की वरिष्ठता के साथ रामनारायण जी के आध्यात्मिक लेखन में निरंतर गति दिखती है । कवितायें बताती हैं कि कवि का व्यापक अध्ययन है , उन्हें छपास या अभिव्यक्ति का उतावलापन कतई नहीं है । वे गंभीर रचनाकर्मी हैं ।
सारी कवितायें पढ़ने के बाद मेरा अभिमत है कि शिल्प और भाव , साहित्यिक सौंदर्य-बोध , प्रयोगों मे किंचित नवीनता , अनुभूतियों के चित्रण , संवेदनशीलता और बिम्ब के प्रयोगों से सोनी जी ने विद्युल्लता को कविता के अनेक संग्रहों में विशिष्ट बनाया है ।  आत्म संतोष और मानसिक शांति के लिये लिखी गई ये रचनायें आम पाठको के लिये भी आनंद दायी हैं । जीवन की व्याख्या को लेकर कई रचनायें अनुभव जन्य हैं । उदाहरण के लिये "नेपथ्य के उस पार" से उधृत है ... खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं, इन मुखौटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैँ । जैसी सशक्त पंक्तियां पाठक का मन मुग्ध कर देती हैं । ये मेरे तेरे सबके साथ घटित अभिव्यक्ति है ।
संग्रह से ही  दो पंक्तियां हैं ... " वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है , आज व्यथा को टांग अलगनी गाथा कोई गढ़नी है । " मोहक चित्र बनाते ये शब्द आत्मीयता का बोध करवाने में सक्षम हैं । रचनायें कवि की दार्शनिक सोच की परिचायक हैं ।
रामनारायण जी पहली ही कविता में लिखते हैं " तुम वरेण्य हो , हे वंदनीय तुम असीम सुखदाता हो .... सौ पृष्ठीय किताब की अंतिम  रचना में ॠग्वेद की ॠचा से प्रेरित शाश्वत संदेश मुखर हुआ है । सोनी जी की भाषा में " ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल , जलधारा प्राणों की लेकर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल " ।
यह जीवन प्रवाह उद्देश्य पूर्ण , सार्थक और दिशा बोधमय बना रहे । इन्हीं स्वस्ति कामनाओ के साथ मेरी समस्त शुभाकांक्षा रचना और रचनाकार के संग हैं । मैं चाहूंगा कि पाठक समय निकाल कर इन कविताओ का एकांत में पठन ,मनन , चिंतन करें रचनायें बिल्कुल जटिल नहीं हैं वे अध्येता का  दिशा दर्शन करते हुये आनंदित करती हैं ।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
वरिष्ठ समीक्षक , कवि और व्यंग्यकार
सेवा निवृत मुख्य अभियंता
ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , जे के रोड , भोपाल ४६२०२३
भोपाल दिनांक २१ जनवरी २०२४


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