झुर्रियों की शक्ल में
झुर्रियों की शक्ल में इस उम्र ने लिक्खी कहानी
सिलवटों के जाल पल पल कह रहे सब कुछ जुबानी
आँख से जो बह रहा यह खार रिश्तों के सफर का
कँपकँपाते ओठ कहते कुसकुसाती वो कहानी
सिलवटों के जाल में घुस कष्ट ने कस दी रकाबें
इन फटी बेवाइयों ने लिख रखी कितनी किताबें
चादरों में छुप छुपा कर जो बिलखते कौन जाने
फाड़ डाली जिन्दगी की अपनों ने सारी किताबें
याद के उठते बवण्डर, हैं झेलते वे मौन रह कर
जब कुरेदा है किसी ने वे उगलते हैं फफक कर
जिन्दगी भर जो कमाया लाड़लों ने सब छुड़ाया
जब थका यह शुष्क पिंजर, अब न कोई दर, न घर
भाग्य से उनकी कमाई हाथ इन के आ गई है
लोभ के भीषण भँवर से बुद्धि ही मारी गई है
एक दिन इनका भी ऐसा आयगा ये बेखबर हैं
चूर हैं कैसे नशे में नियति ही मति खा गई है
रामनारायण सोनी
२६.१.२४
No comments:
Post a Comment