गान मस्ती के उकेरो
रागिनी स्वर ले स्वयं ही
कण्ठ में भर जायगी
झनझनाती पायलों की
थाप पर थिरकन चले तो
क्या कामिनी रुक पायगी?
वह गत सुनाती जायगी
मौज में उड़ती पतंगे
देखती है कब जमी पर
डोर को भी टाँगती वह
नील नभ की खूँटियों पर
जब हवा के पंख लगते
खिलखिलाती जायगी
वह गत सुनाती जायगी
बूँद बन कर जा मिलो तुम
धार जो मस्ती में बहती
या मिलो बरखा में तुम जो
झूम कर मस्ती में झरती
या बनो शबनम सुबह की
ऋतु शरद वो सुहानी आयगी
वह गत सुनाती जायगी
है जरा सी जिन्दगी ही
पुष्प की और गन्ध की भी
गोद में वह पालता भी
बाँटता मधुर मकरन्द भी
जानता निज कंटकों से
सब पंखुड़ी छिद जायगी
वह गत सुनाती जायगी
रामनारायण सोनी
२७.१.२४
No comments:
Post a Comment