फिर माटी माटी में धर दी
तुमने नयन दिये जग देखूँ पर आँसू उसमें रच डाले
देख सकूँ सच को सच सा फिर सम्मोहन क्यूँ भर डाले।
दे दी प्यास अगर मुझको यह फिर मरीचिका क्यूँ दे दी
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इनमें छाले।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इनमें छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
स्वीकारे अभिषाप नियति के सब तेरे वरदान समझ कर
पग पग पर क्यूँ भरे छलावे व्याकुल हूँ आकण्ठ उलझ कर।
अधरों को वरदान दिया वे मुखड़े पर मुस्कान बिखेरें
फिर क्यों पीना पड़ता इनको कालकूट के प्याल भर भर।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
साँस रची जीवन जीने को तो क्यों फिर उसांसें भर दी
बल का कर आधान करों में पाप पुण्य सिर गठरी धर दी।
क्यों माटी को रौंद रहे तुम खेल खेल में बारी बारी
पहले जीवन माटी में भर, फिर माटी माटी में धर दी।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
सागर के इस छोर खड़ा मैं भरी सुनामी सागर में
जर्जर तरणी अपनी ले कर कैसे उतरूँ सागर में
सागर तू है सागर तेरा और सुनामी भी तो तेरी
कौन उबारे मुझे उफनते और विकट भवसागर में
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
रामनारायण सोनी
04.01.24
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