बन गई पगडण्डियाँ ये हाथ की तिरछी लकीरें
खो गई मंजिल बची बस हाथ की तिरछी लकीरें
इस रोशनी के गाँव में हैं आ बसे सब ओर साये
भाग्य की कोरी घिसावन लग रही तिरछी लकीरें
इन लकीरों ने मुझे भी था कभी तुम से मिलाया
प्रीत का प्यारा रसायन था कभी तुम ने पिलाया
अब अचानक खो गई वे हाथ की सारी लकीरें
लोरियाँ गा कर कभी था कष्ट में मुझको सुलाया
रामनारायण सोनी
२२.१.२४
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