पीड़ा
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया
गौतम को जग की पीड़ा ने तपा तपा कर बुद्ध किया।
जन जन की पीड़ा को जब गाँधी जी ने वरण किया
दूर फिरंगी को कर देंगे मन में दृढ़ संकल्प लिया।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
दुःखी क्रोंच की पीड़ा से ही प्रथम छन्द इक था जन्मा
पीड़ा की जलती वेदी पर बैठे परमहंस शुचि धर्मा।
कुन्ती ने पीड़ा वर माँगा मन से अंगीकार किया
अपनी राम कहानी में भी पीड़ा बनी रही उमर भर कर्मा।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
युगपुरुषों ने कदम कदम पर कितनी बाधा व्यथा सही
निज कर्मों के आलेखन से जग को अपनी कथा कही।
पगथलियों में पीड़ा के हो चाहे जितने घाव भरे
तपी भगीरथ के अनुपथ पर पावन गंगा धार बही।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
रजनी के आलोक अश्रु को पातों ने जब जब झेला
उसी भोर ठिठुरी पीड़ा में शबनम मोती बन कर खेला।
तम की काली छलनाओं से जब जब रश्मिपुंज डरा
प्राची से पीड़ा हरने को रवि का अरुण सरोज खिला।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
रामनारायण सोनी
2.11.48
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