भोर की संकल्पना जगने लगे तो
काट बन्धन तिमिर को अवसान देना
रात भर लड़ती रही है रश्मियाँ
प्रात को उस पल ज़रा सम्मान देना ।।
हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी वे वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मि को अधिमान देना।।
रामनारायण सोनी
30.11.2023
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