Friday, 10 November 2023

पीत पात झरते हैं

पीत पात झड़ते हैं

अभी अभी बीता है पतझड़
है कुछ मौन अभी बाकी
झरे गिरे से उन पातों की
अभी काल ने यादें ढाँकी

जो जगह पुराने पातों ने
पतझारों में कर दी खाली 
आज नियति ने घुमा चक्र
फिर से नव संसृति रच डाली

पल्लव अपना जीवन लेकर
शाखों पर जब उतरे थे
अपनी करनी के बलबूते
कुछ बिखरे कुछ निखरे थे

पादप के इक इक हिस्से को
अपना धर्म निभाना है
धरा धाम से जो जो पाया
धरा यहाँ रह जाना है

जब कोंपल शाखों में जन्मी
मधुमास बड़ा बौराया था
पीपल ने थी पीटी ताली 
झरनों ने मङ्गल गाया था

उत्स हुआ बन का आंगन
भ्रमरों ने वीथी घूम घूम
देखा पुष्पों को चुपके से
कलिका का माथा चूम चूम

उस पादप का रोआँ रोआँ
था कितना रोमांच भरा
मूलों ने भेजा अभिसिंचन 
था फूलों से मकरंद झरा

उन शाखों से लिपटी लिपटी
मृदु लतिका ने स्पर्श किया
अंकुर का नव अरुणाई से
फिर हौले से श्रृंगार किया

रजनी की शीतल अलकाएँ
शबनम की माला ले आई
फर फर करती चिरिया भी
फुनगी पर बैठी मुस्काई

अमलतास की वेणी लटकी 
केकी करती वृन्दगान
अमरबेल ले पीत वसन
बुन बुन कर ताना है वितान

जीवन के चक्र निराले हैं
कण कण है गतिमान यहाँ
बंजारे की बस्ती ठहरी
है आज यहाँ तो कल वहाँ

जब से यह धरती जन्मी है
काल बली कुछ रचता है
रोज बनाता रोज मिटाता
काल कभी ना मरता है

झर जाऊँगा मैं डाली से
जैसे झरते हैं पीत पात
इससे पहले भी आए हैं
कितने ढलते सांझ प्रात

पर सब के सब वे थे अपने 
कर्मों धर्मों से बँधे बँधे
नियति परिधि में नियमों की
निरत रहे सब सधे सधे 

फिर जीवन की संध्या आई
घूमा था जब वह कालचक्र 
श्वासों की माला टूट चली
थी दृष्टि काल की महावक्र

झरते पातों की तब खुद ही
शाखों से ममता छूट गई
वह साँझ रात की गोदी में
झीनी गागर सी टूट गई

आया पवन झकोरा तब वह
आँगन आँगन दिया बुहार
नियती नटी है कब चुप बैठी
फिर फिर उसने किया सिंगार


रामनारायण सोनी
११.११.२३



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