मधुगीत गुन गुन कर रहा
शब्दो के इस महारास में,
अर्थों के मधुरिम प्रभास में
भावों में, अहसासों में, मधुगीत गुन गुन कर रहा है।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
दो हृदय दो तन विकम्पित,
ताल सुर हैं द्रुत विलंबित
बँध पुलिन में बह रही है
यह धार सरिता की स्वरित।
आगतों के स्वागतों में
पुष्प के मकरन्द मुखरित
घन गरज की भेरियाँ सुन
नाचते है मोर प्रमुदित।।
तार वीणा के जगाने मधुमीत तुन तुन कर रहा है।।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
कोकिला के कंठ जागे,
चातकों के भाग जागे
उपवनों में गंध भारित
चहुँ दिशा में पवन भागे।
ताल में बनफूल पादप
पात ने माँडी नव रंगोली
झर झराती झिरनियों के
मधुरवों के रार जागे।।
श्वाँस में प्रश्वाँस में मनमीत कुन मुन कर रहा है।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
रामनारायण सोनी
३.११.२३
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