तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
क्यों आये क्यों गये जिन्दगी की इस चौखट पर
मैं था मेरी आस उनींदी बाट जोहती तेरी तट पर
बोई प्रीत हथेली सरसों जैसे सूख गई उगते ही
लौटे नहीं रंग जाकर फिर तुमने जो छींटे मनघट पर
तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
वैसे तो हर माह अमावस का अँधियारा आया है
अबकी बार महीना पूरा अँधियारा ले कर आया है
जो लगते थे कभी सुहाने उन उड़ते मेघों ने मेरे इस
व्यथित हृदय की तप्त धरा पर क्रन्दन ही बरसाया है
तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
तुम तो गये गये पर मेरे सपने सारे संग ले गये
तूफानों में घिरी नाव को ऐसे कैसे भँवर दे गये
उस पतंग का ठौर कहाँ जो भाग्यचक्र ने काटी हो
रीता कंठ रुँधी आवजें गीत अधर पर धरे रह गये
तुम जो गये गये संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
रामनारायण सोनी
३०.११.२३
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