चूके तो चुक जाओगे
बसन्त गा रहा है,
पवन खुद झूल रही है
मस्ती में बेलों के झूले पर
मुस्कुरा रहा है बनफूल शाख पर
नहला रही है किनारे की दूब को
झरने की रेशमी फुहारें
और तुम हो कि
झाँक भर रहे हो
अपनी बनाई दीवार के
एक बारीक से सूराख से
निकलो बाहर
निकलो अभी बाहर
फैलाओ अपने मन की बाजुएँ इतनी
कि इनमें समा जाए
कायनात पूरी की पूरी
कौन जाने यह समा फिर लौटे न लौटे
चूके तो चुक ही जाओगे
रामनारायण सोनी
२१.११.२३
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