मैं नाचता-गाता भी हूँ
अपने भीतर ही भीतर कभी कभी मैं
नाचता हूँ, गाता हूँ, उछलता हूँ, कूदता हूँ
क्योंकि मैं उस घड़ी
मेरे भीतर में होता है एक महारास
और तब तब गाता हूँ
कबीर के अनहद के बोल ले कर,
नाचता हूँ पहन कर मीरा के पगघुँघरू,
उछलता हूँ कान्हा की गेंद बन कर
कूदता हूँ आनन्द की कालिन्दी में
उसी कदम्ब की डाल से
तब तब यह सारा बाहर
पड़ा रह जाता है बाहर ही
रह जाता हूँ मैं और मेरा वह
रामनारायण सोनी
२५.१२.२३
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