कौन था वो ...
जो राह दिखलाता रहा
कौन था वो जो...
दुर्गम पथ में लिए जाता रहा
मैं अकेला खड़ा था विमूढ़ सा
ऐसे में उँगली पकड़े लिये जाता रहा
जानता नहीं था, मैं मुझको ही
वो मुझी से मुझी को मिलाता रहा।
कौन थे, क्या थे वे मेरे लिये?
उस एक सक्ष में समाया था
मेरा गुरू, मेरा मित्र, मेरा प्रदर्शक
वे थे परम आदरणीय के.एस. रावत सा.
हे दिव्यात्मा!!
तुम प्रणम्य हो! अभिनन्दनीय हो!!
मैं ईश्वर का कृतज्ञ हूँ कि
उसने मेरे जीवन में
तुम्हें ट्रान्सफार्म करने भेजा।
मेरे वटवृक्ष, मेरे दीपस्तम्भ!
प्रणम्य मनसा देवं। दिव्यं च तदात्मा:।।
ॐ शान्तिः! शान्ति:!! शान्तिः!!!
प्रणत, मैं
No comments:
Post a Comment