राम को नाम अधार है
प्रीत गयी सब रीत गई गये सारे ठाठ ठठेरन के
सब तात गये मन मीत गये टूटे सपन सबेरन के
ठठरी का है छूटा ठौर कहीं न नाते रहे ममेरन के
थक हार गिरे कछु धाय चले बंजारे लोग बसेरन के
नाम गया अरु धाम गया राउर रंक मिले एहि घाटे
छैल छबीली ओ जोगी जती अन्त मिलै सबै एहि बाटे
कौन सहाय करै बिना पनही राह बिछे काँटे ही काँटे
राम को नाम है एक अधार सबही भव बंधन काटे
रामनारायण सोनी
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