Monday, 18 December 2023

बिखरो खुशबू की तरह

बिखरो खुशबू की तरह

ये माना कि खुशबू! खुशबू है
कुदरत की नायाब सी इनायत
फिर भी छ्टपटाती है
भीतर ही भीतर, 
ढूँढती ही रहती है
कोई फूल, कोई कस्तूरी मृग
मिल जावे कहीं से
ताकि बिखर सके दिग्दिगन्त में
तुममें भी कुछ अच्छा मौजूद है
जो चाहता है बिखरना
मुझ में भी है
चलो ढूँढते हैं वे फव्वारे
जहाँ से बिखर सकें हम
खुशबुओं, झरनों, धूप 
और बारिश की तरह

रामनारायण सोनी
१९.१२.२३

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