यों ही मुझको भूल सकोगी?
टूटे दिल की किरच किरच में देखोगी प्रतिबिम्ब गड़ा
पाओगी मुझको ही जब तुम धूल भरा सा वहाँ पड़ा।
तब भी तुमको ही ढूँढेंगी रूह मेरी बिखरे सपनों में
पाओगी मन के आँगन में मुझको अब भी वहीं खड़ा।।
जितना सच था बचपन उतना मेरा प्रेम निवेदन सच है
जितना रस था बीच हमारे मुझमें शेष अभी भी सच है।
ज्वालाओं में तप कर निखरे मन कुन्दन सा उतना सच है
जितना पावन धरा गगन का रिश्ता उतना रिश्ता सच है।।
रामनारायण सोनी
१८.१२.२३
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