तुम कहाँ चले
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले
अपनी गहन पिपासा ले कर आशा के मृग जीते थे
नभ में मेघों के शावक से सपने दौड़े फिरते थे।
अन्तस की सूने जंगल में कुछ शूलों फूलों के संग
किंशुक अपने शुष्क अधर से दावानल को पीते थे।।
पतझड़ में मन के शलभों की प्रीत जगा कर कहाँ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।।
सागर की छाती पर मैं था लहर लहर सा खेल रहा
शिखर चढ़े ध्वज सा मैं कितने अंधड़ को था झेल रहा।
सूने पनघट रीती गागर थका थका अभिसार लिये
मरुथल की तपती ज्वाला में यहाँ वहाँ था डोल रहा।।
ऐसे में रूखे अधरों पर प्यास जगा कर कहाँ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।।
तुमसे पहले इस दरपन में मुखड़े आ कर चले गये
धड़कन के तारों को यों ही हिला डुला कर भले गये।
उनके गीतों की धारा में पागल मन ना बहा कभी
खिली साँझ में द्वार देहरी दीप जले नित नये नये।।
मन के गोपन कोने की तुम आसंदी क्यों छोड़ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।
रामनारायण सोनी
१२.१२.२३
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