जब भी लिखता हूँ
मैं बात मेरी लिखता हूँ
अपने पन्नों पर अपनी कलम से लिखता हूँ
कोई नहीं जानता
थोड़ी देर बाद मैं भी नहीं जानता
किसके लिये? क्यों? और किस सबब से
वह बातें उगल गई
अनजाने सच सच कह गई
जाने कब वह
जमाने के दिलों की, इसकी, उसकी
और तुम्हारी मिल्कियत हो गई
रामनारायण सोनी
१५.३.२४
रोज रोज ही दौड़ता हूँ मैं
उस क्षितिज के उस बिंदु की तरफ
जहाँ से आखिरी बार
ओझल हुई थी तुम
लौट कर घर आने से पहले ही
घिर आती है बैरी साँझ,
जलाता हूँ फिर वही दीप
जो भरसक फैलाई अपनी रोशनी में
वह भी ढूँढता है तुम्हें ही
सौंपने के लिये तुम्हें मुझे
फिर लील गया अँधियार उसे भी
मन है कि मानता नहीं
फिर भी, फिर से वही
रामनारायण सोनी
१५.३.२४
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