कच्चे रंगीन धागे
वक्त आता है दबे पाँव
बँटवारा कर जाता है खून का
एक हिस्से को मिलता है छत, दीवारें, देश
दूसरे को अनचीता, अनबूझा विदेश
खाली हो जाता है ऑंगन, अँगीठियां भी
माथे पर पीछे से चपत मार कर
भागने जाने वाली वह चुहल बाज छाया
तब से, बस आती है एक दिन
सावन के उस आखिरी दिन
बाँध कर लौट जाती है
कच्चे रंगीन धागे कलाइयों में बाँध कर
रामनारायण सोनी
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