फिर से दीप जलाऊँगी
मैं बुझते तारों में फिर से आशा दीप जलाऊँगी
मुरझाए फूलों को फिर से सौरभ पान कराऊँगी।
बिखरे छितरे, ठहरे ठिठके नील गगन के मेघों को
भर आँचल में अमित नेह से पवन हिंडोले झुलवाऊँगी।।
मैं फिर से दीप जलाऊँगी,
मैं आशा दीप जलाऊँगी।।
यहाँ नयन की कोरों पर जो सपन अलोने सोये हैं
प्राणों की वंशी में रूठे स्वर अस्फुट हैं, खोये हैं।
विकल हृदय में, रुँधे कण्ठ में, इन सूखे अधरों पर
अगणित पीड़ाओं ने वे कितने ही पल ढोये हैं।।
मैं फिर से दीप जलाऊँगी,
मैं आशा दीप जलाऊँगी।।
रामनारायण सोनी
१८.०२.२४
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