Sunday, 11 February 2024

जीत सका न मैं मुझ से

जीत सका न मैं मुझ से

हारा तुम से कितना खुश था
फिर मैं जीत सका न मुझ से

जाग रहे सपने पलकों पर 
ना रात गई ना सुबह मिली
खोया वह ऋतुराज मरू में
न पात बचे न शाख खिली
   चोरी चोरी चुपके आ कर
   छीन लिया है मुझको मुझ से
   फिर मैं जीत सका न मुझ से

दृग मेरे अविरल नीर भरे
मन मेरा कब तक धीर धरे
जीवन की टेढ़ी डगर डगर
पग पग पर निर्मम शूल धरे
   इन रूखे सूखे अधरों से वे
   बोल न बोले जाते मुझ से
   फिर मैं जीत सका न मुझ से

सिन्धु में स्मृतियों के ज्वार
निखिल रजनी में भरते खार
जाग उठते आरत ये स्वर
हृदय कैसे सहता अधिभार
   स्वप्निल बीजों का मर जाना
   सहा नहीं जाता है मुझ से
   फिर मैं जीत सका न मुझ से

जले हैं कैसे तन-मन-प्राण
प्रकम्पित पल पल होता मान
श्रवण में गूँजे कितने रव
हृदय में चुभते हैं पवमान
   कैसे मैं थिर रह सकता हूँ
   व्यथा कही ना जाती मुझ से
   फिर मैं जीत सका न मुझ से

      रामनारायण सोनी
      ११.०२.२४

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