तुम बिना हारे जीते हो
मैं हार कर भी नहीं हारा
क्योंकि मैं तो
तुम्हें जिताने के लिये हारा हूँ
तुम्हें जिताना चाहता था..
क्योंकि मैंने इसे अपनी जीत समझा है
फर्क इतना सा ही है
कि तुम जीत कर जीते
मैं हार कर जीता हूँ
तुमने जीत को जीत माना है
मैंने हार को जीत सिद्ध किया है
तुम जीतते नहीं तो मैं हार जाता
मैं जीत गया होता, तो वह मेरी हार होती
तुम्हारी जीत का स्वाद अलग
मेरी जीत का स्वाद अलग
रामनारायण सोनी
२४.०७.२३
No comments:
Post a Comment